जमीं पर उतरे तारे

Varanasi Updated Thu, 29 Nov 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। देवाधिदेव की नगरी काशी में देव दीपावली पर्व पर सभी कुंड लाखों दीयों की रोशनी से नहा उठे। कुंडों के चारों ओर बने भवन भी रंगीन झालरों से सजाए गए थे। कुंडों में जल पर बिखर रहे प्रकाश बिंब सुखद आनंद की अनुभूति करा रहे थे। भक्ति गीतों को सुन लोग भावमग्न होते रहे। कार्तिक पूर्णिमा की धवल चांदनी भी फीकी नजर आ रही थी। घंटा-घडि़याल और शंख ध्वनि के बीच मंत्रोंच्चार से वातावरण भक्तिमय हो गया था।
कार्तिक पूर्णिमा को भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर और योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी नरकासुर का वध किया था। प्रसन्न होकर देवताओं ने स्वर्ग में दीपावली मनाई। तभी से इस पर्व का नाम देव दीपावली पड़ा। ऐसी मान्यता है कि इस दिन देवता पृथ्वी के काफी निकट होते हैं। इस दिन नदियों, कुंडों में दीपदान करने से पूर्वजों को स्वर्ग में पुण्य प्रकाश मिलता है। कृतिका नक्षत्र में भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ था। इसलिए इस माह का नाम कार्तिक पड़ा। पंचगंगा घाट पर पहली बार 1930 में काशी नरेश ने युद्ध में मारे गए सैनिकों की सद्गति के लिए दीपदान किया था। तब से यह परंपरा क्रमश: आगे बढ़ती गई। भगवान श्रीराम ने ब्रह्म हत्या के प्रायश्चित के लिए पांच स्थानों पर रामेश्वर लिंग की स्थापना की। इनमें से एक रामकुंड भी है। इस कुंड को सप्तपुरियों में एक अन्य नाम अयोध्यापुरी से भी जाना जाता है। श्रीराम कुंड, सूरज कुंड और लक्ष्मी कुंड गंगा जी से जुड़े हैं। गंगा का जलस्तर बढ़ने पर इन कुंडों में जल आता है। इस कुंड के बीच में राम-जानकी का विग्रह है। श्रीनगर क्षेत्र विकास समिति के अजय अग्रवाल, प्रवीण गुप्ता, डा. केके शर्मा, संकल्प संस्था के अनिल अग्रवाल, दर्शन यादव आदि ने विग्रह और कुंड की विधिवत पूजा अर्चन कर प्रसाद वितरण किया। 5100 दीयों और झालरों से कुंड को सजाया गया था। आतिशबाजी भी की गई।
लक्ष्मी कुंड पर जनता हिताय समिति की ओर से अष्ट महालक्ष्मी की जल विहार झांकी सजाई गई। 51000 दीपों से सीढि़यां सजाई गईं। देवी, श्री यंत्र, बाबा विश्वनाथ की विधिवत पूजा की गई। प्रसाद वितरण किया गया। दुर्गाकुंड पर देवी का दर्शन पूजन करने वाले श्रद्धालुओं ने सीढि़यों पर दीपदान किया।
जागृति फाउंडेशन के महासचिव रामयश मिश्र के नेतृत्व में पुष्कर तालाब को दीपमालाओं से सजाया गया था। काशी पुष्कर तीर्थ का प्रतीक है। इस कुंड में स्नान करने पर वही फल मिलता है जो राजस्थान के पुष्कर तीर्थ में स्नान करने से मिलता है।
सूरज कुंड की मढि़यों को नागरिकों, युवतियों ने रंगोली से सजाया था। 11 हजार दीपों की रोशनी से कुंड नहा उठा। ऐसी मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से कुष्ठ रोग खत्म हो जाता है। ईश्वरगंगी तालाब का भी पौराणिक महात्म्य है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा त्रिशूल के गाड़ने से यहां पर आदि गंगा प्रकट हुई थीं। पश्चिमी छोर पर ऋद्धि-सिद्धि की मूर्ति है। यहीं पर जमेश्वर महादेव का मंदिर है। बाबा कीनाराम के गुरु भाई बाबा लोटा दास का सिद्ध मठ भी है। तालाब पर सन 2000 में यशोदा देवी और किरन श्रीवास्तव ने देव दीपावली का पूजन शुरू किया। बुधवार को श्री बजरंग व्यायामशाला की ओर से तालाब की सीढि़यों को बीस हजार दीपों से सजाया गया। जागेश्वर महादेव की पुजारी ने पूजा संपन्न कराई। नागरिकों ने जमकर आतिशबाजी की। इन सभी तीर्थ कुंडों का धार्मिक उल्लेख विष्णु पुराण, सूर्य पुराण, स्कंध पुराण, पद्म पुराण के साथ काशी खंड में मिलता है।

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