विश्व मोहन ने वीणा से चलाया सम्मोहन

Varanasi Updated Tue, 27 Nov 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। सुकूने दिल का कुछ तो एहतराम करूं / जरा नजर मिले तो मैं उन्हें सलाम करूं / मुझे तो होश नहीं आप ही मशविरा दीजे / कहां से छेड़ूं फंसाना कहां तमाम करूं...। संगीत साधना के ऊंचे मानकों पर जन्मे कुछ ऐसे ही प्यार के हसीन अंदाज और खुशगवार लम्हों के बीच गंगा महोत्सव की तीसरी शाम लय-ताल के विविध रंगों से रंगीन हुई। विश्व मोहन भट्ट की मोहन वीणा के तार जब झंकृत हुए तो तालियों की गड़गड़ाहट के बीच सम्मोहन का जादू सा चल पड़ा। कथन नृत्यांगना सुरभि ने जहां तीखे स्वाद से लेकर चौवन चक्कर तक के टुकड़ों में अनेक प्रयोग किए, वहीं लोक नृत्य और गायन का भी जलवा छाया रहा।
महोत्सव में बड़े कलाकारों को सुनने के लिए घाट-सीढि़यों की दीर्घा में आतुर दर्शकों के चेहरे रात करीब पौने आठ बजे तब खिले जब सुरभि सिंह कथक नृत्य लेकर आईं। गंगा स्तुति के बाद उन्होंने पच्चीस ताल से शुरुआत की। उपज के बाद थाट, परन, टुकड़े, तिहाइयां और कथक के विशेष अंग गतों पर उन्होंने थिरकन से हर किसी को मुरीद बना लिया। नृत्य में कई प्रयोग भी उन्होंने किए। सामाजिक बिखराव, एकजुटता के अलावा मिर्च के तीखे स्वाद को भी पावों के घुंघरू की झनकार और ताल से उन्होंने प्रदर्शित करने की कोशिश की। इसके बाद दादरा के बोल ‘बिहारी को अपने बस कर पाऊं’.. की प्रस्तुति से उन्होंने विराम लिया। तबले पर विकास मिश्र, गायन हयात हुसैन, सितार नवीन मिश्र, वायलिन दीपक मिश्र, बांसुरी पर राकेश कुमार ने संगत की। इनके बाद पद्मश्री विश्व मोहन भट्ट का दर्शकों ने तालियों से स्वागत किया। राग मारू बिहाग की उन्होंने अवतारणा की। अलाप, जोड़, झाला के बाद विलंबित और द्रुत गतें बजाईं। इसके बाद सात स्वर में मोर की आवाज पर आधारित उनका प्रयोग संगीत रसिकों के लिए जादुई था। अंत में एक धुन बजाकर उन्होंने विदा ली। तबले पर कुशल संगत की पं. रामकुमार मिश्र ने। इनके बाद बैले नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति पर लोग झूम उठे। पं. लच्छू महाराज बैले सेंटर की ओर से इस प्रस्तुति का निर्देशन किया कथक नृत्यांगना कुमकुम आदर्श ने। उड़ीसा के गुट्टीपुआ लोक नृत्य की मोहक प्रस्तुति हुई। शिव की आराधना के इस नृत्य का निर्देशन किया सत्यपीर पलाई ने। पखावज, हारमोनियम, मंजीरा के साथ नृत्य किया वी गुलशन, तापस कुमार, उपेंद्र, कैलाश, प्रकाश, जयेंद्र, आलोक, दीपक, विश्वनाथ ने। इनके बाद रीना पांडेय ने लोक गीत से फिजा बदली। ‘गंगा मइया तोहरी चरनिया के दासी’ के बाद ‘गरमी में नीक लागे फूस के झोपडि़या में’.. .और ‘भोरहीं के गइल पियवा’.. जैसे गीतों से उन्होंने समां बांधी। महुआ चैनल के स्वर संग्राम की प्रतिभागी रहीं विजेता गोस्वामी ने भजनों से स्वर गंगा बहा दी। ‘मोरे पिछवारे कान्हा जब तूं आना मीठी-मीठी बंशी बजाना’... के बाद ‘पिया आव सिवान से अन्हार भइले आई/देवर तनि देहियां पे डालि दा रजाई’... को सुनाया। तबले पर राजकुमार, ढोलक विजय पांडेय, कीबोर्ड तबरेज और पैड पर परवेज ने संगत की।

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