अमृत न सही मन का कलश तो काशी में छलका

Varanasi Updated Tue, 27 Nov 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। समुद्र मंथन के बाद निकले अमृत कलश से छलक कर चार बूंदें हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में गिरी थीं। वहां कुंभ लगते हैं। तीनों लोकों से न्यारी काशी में भले ही तब अमृत की बूंद न छलकी हो लेकिन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय के एसोसिएशन प्रोफेसर हीरालाल प्रजापति ने अपनी तूलिका से मन के सागर के मंथन का अमृत कलश ऐसा उड़ेला कि जिसे प्रयाग महाकुंभ का लोगो चुन लिया गया। प्रतियोगिता में लोगो चुने जाने पर वह बेहद खुश हैं। वह इसे सर्व विद्या की राजधानी के लिए गौरव और सम्मान की बात है।
उन्होंने बताया कि पर्यटन विभाग और उत्तर प्रदेश सरकार ने लोगो के लिए प्रतियोगिता आयोजित की थी। सभी आर्ट कालेजों से प्रविष्टियां मांगी गई थीं। प्रत्येक प्रतिभागी को तीन लोगो बनाकर देना था। कुल 100 से ज्यादा प्रविष्टियां मिली होंगी। उनमें से उनकी प्रविष्टि चुनी गई। उनका कहना है कि निर्णायकों ने केवल डिजाइन नहीं चुनी है बल्कि उसके पीछे के फलसफे पर भी गौर किया है। समुद्र मंथन तो अतीत की बात हुई। लोगो बनाते समय मन में विचार आया कि आदमी जीवन में मन का मंथन करता ही रहता है। उसमें से कभी विष निकलता है और कभी रत्न तो कभी अमृत। इसी को उन्होंने कागज पर उकेर दिया। लोगो में एक कलश है। उसके ऊपर की दो रेखाएं गंगा और यमुना की द्योतक हैं। सरस्वती जो हर किसी का विवेक भी हैं, उसे कलश के बीचोबीच बनाया गया है। कुंभ की कैलिग्राफी इस तरह की गई है कि मंथन का आभास होता रहे। भ अक्षर को घड़े के रूप में ही रखा गया है, जिससे गति प्रतीत हो। उन्होंने कहा कि जिंदगी चलती रहती है। उसकी लय में बहने पर कुछ महसूस नहीं होता है। उसके विपरीत बहने के लिए आदमी को संघर्ष करना पड़ता है। बनारस में उल्टी गंगा बहती है, लिहाजा यहां रहने वाला धारा के विपरीत तो सोचता ही है। लोगो में बनारसी सरलता भी है।

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