बबूल के वन में, बसंत से खिले थे धूमिल

Varanasi Updated Sat, 10 Nov 2012 12:00 PM IST
खेवली। खेवली... वह सौभाग्यशाली गांव जहां नौ नवंबर 1936 को जन्मे थे सुदामा पांडेय धूमिल। जयंती के बहाने ही सही शुक्रवार को अपराह्न खेवली के बहाने धूमिल और धूमिल के बहाने खेवली का अतीत टटोला गया। शहर के चुनिंदा बुद्धिजीवी उनकी कविताओं के तेवर, उपमेय और उपमानों की बानगियां दोहराने के लिए खेवली में जमा हुए थे।
धूमिल की पालक मां (चाची) प्रभावती देवी को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पक्के घर के बरामदे में रखी बड़ी सी तस्वीर से धूमिल उन्हीं को देख रहे हैं। वहां खुद से रूबरू होने वाले हर शख्स से वह कहतीं भी ‘हमहीं के देखत हउअन.. बतावा अब अइसे कइसे खियाई अपने लाल के’...। इतना कहते-कहते उनकी आंखें छलक उठतीं। धूमिल से नौ माह बड़े भाई रमाशंकर पांडेय ने गांव के उस पीपल को याद किया जिसके नीचे बैठ कर धूमिल उन्हें इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली महिलाओं की एक पत्रिका के संपादक द्वारा प्रेषित देश-विदेश से प्रशंसकों द्वारा लिखे गए पत्र दिखाए थे। तब खेवली में 50 एकड़ में फैला बबूल का जंगल था जिसकी याद अब भी उनके कई समकक्षों में विद्यमान है। बबूल का जंगल सिकुड़ गया मगर उनसे जुड़ कर कविता में ढली धूमिल की यादें दुनिया भर में फैल गई हैं। इस अवसर पर जुटे लोगों ने धूमिल को खुद से संवाद करती रचनाओं के माध्यम से भी याद किया। किसी ने ...कल हरहुआ के बाजार में सुदामा पांडेय मिले थे, बबूल के वन में, बसंत से खिले थे... और तीसरे वाचन के बाद कविता भी धर्र्मशाला हो जाती है...का संदर्भ लिया तो कोई बहुचर्चित रचना मोची राम में मगन रहा। कोई 1963 में ज्ञानोय में प्रकाशित लेखमाला कविता पर क्षण भर में डा. नामवर सिंह की टिप्पणियों का उल्लेख करता रहा। सुदामा पांडेय धूमिल जनसंपर्क समिति खेवली की ओर से आयोजित जयंती समारोह के मुख्य अतिथि डा. रामसुधार सिंह थे। इस अवसर पर डा. शिवकुमार मिश्र, श्रद्धानंदी, मूरत देवी, बेचन सिंह, रत्नशंकर पांडेय, आनंद शंकर पांडेय, देवी शंकर सिंह, डा. प्रभाकर सिंह ने विचार व्यक्त किए। उत्तर प्रदेश भोजपुरी संघ की तरफ से धूमिल की जयंती मनाई गई। इसमें अपूर्व नारायण त्रिपाठी, मूलचंद सोनकर, डा. आनंद प्रकाश तिवारी, राजेंद्र गुप्त, डा. सरोज आदि उपस्थित थे।
जयंती पर उठी मांगें
धूमिल के नाम पर वरुणा तट पर पक्का घाट बने
धूमिल साहित्य केंद्र व शोध संस्थान की स्थापना हो
पैतृक गांव खेवली में स्मारक बने
रामेश्वर बाजार से खेवली तक पक्की सड़क का निर्माण हो
धूमिल की आदमकद प्रतिमा की स्थापना हो

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