पूर्वांचल के किसान बैकोलोडर में लगा रहे जमापूंजी

Varanasi Updated Fri, 09 Nov 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। गाजीपुर के दयाशंकर तिवारी बैंक ड्राफ्ट जमा करके तीन हफ्ते से बैकोलोडर मशीन का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने कंपनी के प्रतिनिधियों से कई जगह से सोर्स भी लगवाया है। बैकोलोडर को आमजन में उसकी एक निर्माता कंपनी जेसीबी के नाम से ही जाना और पुकारा जाता है। दयाशंकर तिवारी ही नहीं बल्कि पूर्वांचल के ज्यादातर जिलों के धनिक किसान बैकोलोडर खरीदने में जमापूंजी लगा रहे हैं। कभी अकेली जेसीबी कंपनी इसकी आपूर्ति करती थी लेकिन आज नौ कंपनियों में तगड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद मांग पूरी नहीं हो पा रही है।
पिछले महीने गाजीपुर में 12 बैकोलोडर मशीनें बिकीं जबकि आजमगढ़ में 16-17 मशीनें हर महीने बिक रही हैं। एक बैकोलोडर की लागत 22 से 25 लाख रुपये के बीच है। जो लोग अकेले नहीं खरीद सकते वे साझेदारी में इसका कारोबार कर रहे हैं जबकि कई लोगों के पास दो-तीन मशीनें आ गई हैं। पहले कृषि के लिए उपयोगी दिखाकर इस पर डेढ़ से दो लाख रुपये तक सब्सिडी ली जा रही थी लेकिन अब यह सिलसिला भी बंद हो गया है। वाणिज्य कर विभाग आसानी से कर में छूट के लिए सी-फार्म नहीं जारी कर रहा है।
बनारस के लोहता, रोहनिया, मिर्जामुराद इलाके में चार दर्जन से ज्यादा मशीनें मिट्टी खोदने में लगी हैं। यह प्रवृत्ति खनन पर रोक लगने के बाद तेजी से बढ़ी है। ईंट भट्ठों और भवनों के निर्माण में मिट्टी की मांग बनी हुई है और उसकी पूर्ति के लिए ग्रामीण इलाकों में धड़ल्ले से खनन चल रहा है। गांवों और कस्बों के नेता पहले सूमो और कमांडर जैसी गाडि़यां चलवाते थे। अब उनकी रुचि बैकोलोडर में बढ़ी है। मशीन नेता की हो तो पुलिस और प्रशासन उसे रोकने में भी हिचकता है। खनन से रोजाना एक मशीन 10 हजार रुपये तक कमा लेती है जबकि किराए पर देने पर छह से आठ सौ रुपये घंटे की दर से आय होती है। बैकोलोडर मशीन बनाने वाली एक कंपनी के प्रतिनिधि सिद्धार्थ राय ने बताया कि अचानक कुछ महीनों से मांग बहुत बढ़ गई है। नौ कंपनियां ऑन डिमांड आपूर्ति नहीं कर पा रही हैं। ज्यादातर खरीदार स्थानीय नेता हैं।

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