फुरसत के लम्हों के बिना कला का अहसास नामुमकिन

Varanasi Updated Wed, 31 Oct 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। प्रसिद्ध कला समीक्षक डा. राजेश कुमार व्यास की मानें तो अंतर्मन की संवेदनाओं से भावना का उत्खनन और बेहतर तरीके से किया जा सकता है। मंगलवार की दोपहर राजघाट स्थित वसंता वूमेन कालेज में कला, कला समीक्षा और कला बाजार पर व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा कि कला वह आश्रय है जहां व्यक्ति को छांव मिल सकती है। उन क्षणों को जीने, उसका एहसास करने के लिए कुछ फुरसत के लम्हों का होना जरूरी है। कहा कि उनकी नजर में तकनीक सिर्फ कला नहीं, बल्कि वह संप्रेषण का सशक्त माध्यम भी है।
ललित कला अकादमी लखनऊ की ओर से कालेज के चित्रकला विभाग में हुई इस परिचर्चा में श्री व्यास ने कहा कि जो कुछ हम देखते हैं वही यथार्थ नहीं होता बल्कि उससे परे भी अंतर्मन की संवेदनाओं से बहुत कुछ देखा जा सकता है। ऐसा जब होता है तो स्मृतियां और अनुभव दोनों ही कला में रूपांतरित होकर देखने वालों के समक्ष हमेशा नया उद्घाटित करते हैं। वैश्वीकरण के दौर में कला, विज्ञान और तकनीक का प्रभाव विभिन्न विधाओं में साफ देखा जा सकता है। वर्तमान कला के परिदृश्य, बाजार और आलोचना पर रोशनी डालते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय कला आलोचना अधिक समृद्ध है। फिर भी उसके प्रबंधन को व्यवस्थित रूप से समझाने और वैसे ही कला के इतिहास को लिखे जाने की जरूरत है। इस दौरान स्लाइड के माध्यम से भी लोगों को कला के बारे में जानकारी दी गई। इससे पूर्व बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। चित्रकला विभाग की छात्राओं ने उन्हें गुलदस्ते भेंट किए। अतिथियों का स्वागत प्राचार्या डा. विजय शिवपुरी ने किया और कृष्ण मूर्ति फाउंडेशन के बारे में जानकारी दी। इस दौरान डा. सत्येंद्र सिंह बावनी, ललित कला केंद्र लखनऊ के डा. एपी गुप्ता, डा. आरती निर्मल समेत तमाम छात्राएं और शिक्षिकाएं उपस्थित थीं। चित्रकला विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर परवीन सुल्ताना ने आभार जताया।

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