गंगा तट पर पूरी होगी सरोद सम्राट के मन की साध

Varanasi Updated Sat, 20 Oct 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। पद्मविभूषण उस्ताद अमजद अली खां के मन की एक बड़ी साध जल्द ही पूरी होने वाली है। जिसका उन्हें वर्षों से इंतजार था, वह घड़ी बेहद करीब आ गई है। वह अपने जीवन में एक बार सरोद के तार छेड़कर उत्तरवाहिनी गंगा की स्तुति करना चाहते थे। अंतत: यह मौका उन्हें श्रीमठ संगीत समारोह की ओर से मिल गया। 29 अक्तूबर की शाम वह बालाजी घाट के निकट गंगा की उन सीढि़यों पर सरोद बजाएंगे, जहां से चंद कदम पर कभी शहनाई सम्राट भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने अपनी संगीत साधना पूरी की थी।
उस्ताद अमजद अली खां ने पहली बार 1962 में बनारस में सरोद की प्रस्तुति दी थी। इसके बाद भारत रत्न पं. रविशंकर की संस्था के बुलावे पर 70 के दशक में भी उन्होंने काशी में वादन किया था। तब उनके साथ पं. सामता प्रसाद उर्फ गोदई महाराज और पं. किशन महाराज जैसे तबले के नामचीन कलाकारों ने संगत की थी। वर्ष 2008 में वह अपने पुत्र के साथ बनारस आए जरूर थे लेकिन संकटमोचन में उनकी उपस्थिति सिर्फ दर्शक के तौर पर ही रही। तब उन्होंने काशी में गंगा तट पर सरोद बजाने की अपनी इच्छा जाहिर की थी। उस्ताद ने अमर उजाला से फोन पर बातचीत में स्वीकार किया कि वह मां गंगा को सरोद के स्वरों से अर्घ्य देना चाहते थे। अंतत: उनकी प्रार्थना मां ने सुन ली। उनके मुताबिक पिछली बार किशन महाराज के निधन के समय जब वह आए थे तब भी बाबा विश्वनाथ का दर्शन करना नहीं भूले थे। इस बार भी वह काशी में कदम रखते ही बाबा का आशीर्वाद जरूर लेंगे।

कोट
मैं काशी में गंगा के तट पर सरोद बजाने का सपना देखा करता था। उम्र के इस दौर में पहुंचने के बाद अब यह साध पूरी होनी वाली है। गंगा घाट पर सरोद बजाने का न्योता पाकर बेहद खुशी हो रही है। बाबा विश्वनाथ और गंगा के लिए बनारस में विशेष राग लेकर आऊंगा।-उस्ताद अमजद अली खां, सरोद सम्राट

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