विज्ञान का सहारा लेने पर मिल जाता है साक्ष्य

Varanasi Updated Wed, 17 Oct 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। डीएनए फिंगरप्रिंट जैसी तकनीक का सहारा लेने पर अपराध के साक्ष्य अपने आप मिल जाते हैं। दो व्यक्तियाें के अंगुठे के निशान कभी एक समान नहीं हो सकते। अपराध का इतिहास मानव इतिहास से जुड़ा है। मंगलवार को बीएचयू के संगीतशास्त्र विभाग में आयोजित विज्ञान की स्थायी पहचान विषयक विशेष व्याख्यान में कुलपति डा. लालजी सिंह ने ये बातें कहीं।
उन्हाेंने कहा कि 1901 में चार प्रकार के रक्त समूह तथा 1937 में आरएच फैक्टर की पहचान की गई थी। सौ से अधिक तत्व हमारे शरीर में हैं। पहले अवधारणा थी कि गुणसूत्र समान होते हैं लेकिन बाद में यह अवधारणा गलत साबित हुई। उन्हाेंने स्लाइड शो के जरिये मनुष्य के जीनोम पर विस्तार से प्रकाश डाला। बताया कि मनुष्य में 50 जीन खराब हो सकते हैं पर इसका विपरीत असर नहीं पड़ता। उन्हाेंने डीएनए की विशेषता बताते हुए कहा कि यह 2.5 मिलियन वर्ष पुराना है तथा डीएनए फिंगरप्रिंट की उपयोगिता को नौ भागों में बांटा जा सकता है। इसमें आपराधिक जांच, उपभोक्ता वस्तुओं की प्रमाणिकता, चिकित्सकीय जांच, प्रजातीय पेडीग्री विश्लेषण, बीज भंडारण, जानवरों में लिंग निर्धारण, सेना के दस्तावेज संरक्षण, वन्य जीवन संरक्षण तथा पारिवारिक मुद्दा शामिल है। उन्हाेंने अत्याधुनिक पीसीआर तकनीक के अंतर्गत दांत और सिर के बाल को डीएनए जांच का सबसे अच्छा सबूत माना। कुलपति ने खुद विकसित तकनीक से वन्य जीवों के किसी भी प्रजाति के बारे में पता लगाए जाने की बात कही। इससे दुर्लभ वन्य जीवों की प्रजातियाें के संरक्षण में भी मदद मिलेगी। इस मौके पर विभाग की ओर से प्रो. लिपिका दासगुप्ता की संगीतशास्त्र ग्रंथ परंपरा : एक अध्ययन नामक पुस्तक कुलपति को भेंट की गई। कुलपति ने अपनी पुस्तक माई ट्रेवल इन द विटनेस बाक्स तथा डीएनए फिंगर प्रिंटिंग: द विटनेस विदइन संगीतशास्त्र विभाग के पुस्तकालय को भेंट की।

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