पूरी दुनिया की गिद्धदृष्टि है भारतीय खेतों पर

Varanasi Updated Sat, 29 Sep 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। गुलामी के दौर में सिर्फ अंग्रेजों की दृष्टि भारतीय किसानों की संपदा पर थी। अब परिदृश्य और भयावह हो गया है। आज पूरी दुनिया के हर ताकतवर देश की गिद्धदृष्टि भारत की सबसे बड़ी संपदा, खेतों पर है। खेत ही किसानों की थाती हैं और जब उनसे वही छिन जाएगी तो न भारत कृषि प्रधान देश रहेगा न कृषक प्रधान।
यह बातें प्रख्यात कथाकार डा. काशीनाथ सिंह ने शुक्रवार को बीएचयू के कला संकाय में आयोजित रामाज्ञा शशिधर की पुस्तक ‘किसान आंदोलन की साहित्यिक जमीन’ के विमोचन समारोह में बतौर अध्यक्ष कहीं। डा. सिंह ने कहा कि किसानों को इस वैश्विक प्रहार से बचाने का माद्दा सिर्फ और सिर्फ साहित्यकारों में है। जो कार्य रामाज्ञा शशिधर ने किया है उसकी शुरुआत काफी पहले डा. रामविलास शर्मा ने की थी।
समारोह के मुख्य अतिथि प्रख्यात इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि शशिधर ने अपने इस शोध को आलोचक के चश्मे से देखा है। उन्होंने सूर, तुलसी को स्पर्श किया है तो घाघ जैसे रचनाकार भी उनके आलोचनात्मक शोध के केंद्र में हैं। करीब चार घंटे तक चले समारोह में शिक्षकों से कहीं अधिक रुचि छात्र-छात्राओं ने दिखाई। कई ऐसे शिक्षक थे जो विद्वान वक्ताओं के भाषण के दौरान सभागार के बाहर तफरी कर रहे थे लेकिन विद्यार्थियों की जमात थी कि टस से मस नहीं हो रही थी। कुर्सियां भर गईं तो छात्र-छात्राएं जमीन पर ही बैठ गए। समारोह में प्रो. महेंद्र राय, डा. अवधेश प्रधान, डा. बलराज पांडेय, गौरीनाथ, युवा कथाकार अनिल यादव, वैभव सिंह आदि ने रचना और रचनाकार पर विचार रखे।

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