हिंदी उपन्यासों में भी मुस्लिम पिछड़ेपन का वर्णन

Varanasi Updated Tue, 11 Sep 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। वर्तमान समय में उर्दू के उपन्यासों में मुस्लिमाें के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का वर्णन मिल रहा है। इसके अलावा, हिंदी उपन्यासाें में मुसलमानाें के पिछड़ेपन को प्रमुखता से उठाया जा रहा है। यह बहुत अच्छी बात है। सोमवार को बीएचयू के राधाकृष्णन सभागार में आयोजित हिंदी-उर्दू उपन्यासाें का मनोवैज्ञानिक अवधारणा विषयक संगोष्ठी में प्रसिद्ध साहित्यकार मंजूर एहतेशाम ने कही।
उन्होंने कहा कि हाल में प्रकाशित कई हिंदी के उपन्यासों में इन बिंदुआें को प्रमुखता से उठाया गया है, जो समाज आपसी समरसता के लिए जरूरी है। अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध कथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह ने कहा कि मंजूर एहतेशाम ने अपने कई उपन्यासाें में भारतीय मुसलमानों की दशा के बारे में वर्णन किया है। उन्हाेंने मनोवैज्ञानिक पक्ष को भी रखा है। अतिथियाें का स्वागत करते हुए कला संकाय के प्रमुख प्रो. एमएन राय ने कहा कि उर्दू विभाग द्वारा महामना की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में इस प्रकार का आयोजन किया गया, जो सराहनीय है। संचालन डा. आफताब अहमद ने किया।

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