यूपी के राजकीय विद्यालयों में शिक्षकों का टोटा

Varanasi Updated Sun, 02 Sep 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। बारह साल बीतने को है पर अब तक नहीं सुलझ पाया यूपी और उत्तराखंड के बीच राजकीय शिक्षकों का मसला। खासतौर पर 1995 में नियुक्त करीब 33 सौ राजकीय शिक्षक आज भी मैदानी इलाकों में आने को हैं आतुर। इधर, पहाड़ वाले शिक्षकों के समायोजन के मसले पर फंसा है राजकीय विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति का मसला। इससे प्रदेश के राजकीय विद्यालयों में शिक्षकों का टोटा हो गया है और पठन-पाठन बाधित हो रहा है। राजकीय शिक्षक संघ चाहता है पहले हो समायोजन फिर रिक्त पदों के लिए निकाला जाए विज्ञापन।
पांच नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश का विभाजन हो गया। लेकिन इन बारह सालों में यूपी में काम करने का विकल्प देने वाले शिक्षकों का समायोजन न होने से राजकीय विद्यालयों में पठन-पाठन बाधित हो रहा है। राजकीय शिक्षक संघ के प्रांतीय महामंत्री जीएस शुल्क बताते हैं कि पहाड़ और मैदानी क्षेत्र के राजकीय विद्यालयों में प्रवक्ता और एलटी ग्रेड शिक्षकों की नियुक्ति का लफड़ा 1984 में शुरू हुआ। तब उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से राजाज्ञा जारी हुई थी कि आवागमन सुगम न होने के चलते मैदान और पहाड़ क्षेत्र के लिए अलग-अलग संवर्ग होगा। यह व्यवस्था 87-88 में लागू हुइर् तो राजकीय शिक्षक संघ ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी जिस पर स्टे मिल गया। लेकिन 1989 में तत्कालीन प्रमुख सचिव की याचिका पर स्टे खारिज हो गया। बंटवारे के ठीक पहले इलाहाबाद, बनारस, झांसी, गोरखपुर, कानपुर आदि मंडलों के जिन लोगों ने हिल कैडर के तहत नियुक्ति पाई उनमें से कुछ को शिक्षा विभाग के कर्मचारियों ने ही समझा दिया कि ज्वाइन न करें। ऐसे लोग तो किसी किसी तरह से बच गए। लेकिन 1995 के बाद जिन लोगों ने पहाड़ पर ज्वाइन कर लिया उनका मामला अब तक लटका है। ऐसे करीब ढाई हजार एलटी ग्रेड शिक्षक और आठ सौ प्रवक्ता हैं। उन्होंने कहा कि राजकीय शिक्षक संघ की मांग है कि राजकीय विद्यालयों में एलटी शिक्षकों की नई भर्ती के पहले उत्तराखंड में फंसे यूपी के शिक्षकों का समायोजन हो।
संकट यह है कि उत्तराखंड के एलटी शिक्षक यूपी में नहीं आ पा रहे और संघ उनके समायोजन की मांग पर अड़ा है। ऐसे में प्रदेश के राजकीय विद्यालयों में साल दर साल शिक्षकों का टोटा बढ़ता जा रहा है। हाल ही में शिक्षा सचिव ने 1425 एलटी शिक्षकों की नियुक्ति की सैद्धांतिक सहमति दी है। लेकि न संघ इसके खिलाफ है। श्री शुक्ल बताते हैं कि हाल के वर्षों में प्रदेश में 254 राजकीय विद्यालय खुल गए पर शिक्षकों की कमी से पठन-पाठन प्रभावित हो रहा है।

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