न नाम चाहिए, न पहचान, मतलब है काम से

Varanasi Updated Sat, 01 Sep 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। गुजराती समाज के युवाओं का धार्मिक रुझान बेशक प्रेरणादायी है। धर्म नगरी काशी में पहली बार होने वाले गोविंदाभिषेक की तैयारियों में लगे युवाओं को न तो अपने नाम से मतलब है और न ही अपनी पहचान से। उन्हें सिर्फ काम से मतलब है। यही वजह है जब सहस्रौदीच्य समाज के बुजुर्गों ने काशी में गोविंदाभिषेक के आयोजन का मन बनाया तो आयोजन का स्वरूप तैयार करने का जिम्मा युवाओं ने अपने कंधों पर ले लिया।
बुजुर्गवार चाहते थे कि गोवर्धन उठाए भगवान श्रीकृष्ण की झांकी पेशेवर कलाकारों द्वारा तैयार कराई जाए किंतु समाज के युवाओं सब कुछ स्वयं करने का न सिर्फ साहस दिखाया बल्कि उसे मूर्त रूप देने में लग भी गए हैं। दूधविनायक स्थित गोविंद माधव भवन में दो सितंबर को होने वाले आयोजन के लिए पर्वत और गुफा का स्वरूप तैयार किया जा रहा है। देवतागण, कामधेनु और ऐरावत के साथ भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक करते दिखेंगे। श्री सहस्रौदीच्य समाज के अध्यक्ष मुकुंदलाल शुक्ल के अनुसार, इस झांकी को तैयार करने वाले युवक दिनभर अपने काम में व्यस्त रहते हैं और शाम छह बजे से मध्यरात्रि तक झांकी तैयार करने में लगाते हैं। इन युवाओं का कहना है कि अपने हाथ से झांकी तैयार करने में वैसा ही सुख है, जैसा होटल के भोजन की तुलना में मां के हाथ के पके भोजन में है।


क्या है गोविंदाभिषेक
वाराणसी। जब भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन धारण की लीला से इंद्र का मान भंग किया था तब भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करने के लिए स्वयं कामधेनु ने स्वर्ग से उनका दुग्धाभिषेक किया था। ऐरावत ने उनका अमृत से अभिषेक किया था। देवताओं ने पुष्पवर्षा की थी। तब श्रीकृष्ण का नाम गोविंद पड़ा था। पुरुषोत्तम मास में गोविंदाभिषेक का विशेष महात्म्य श्रीमद्भागवत में बताया गया है। इस आयोजन में चारो वेदों के विद्वानों द्वारा ऋचाओं का सस्वर पाठ किया जाता है।

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