देश में न्यायपालिका तो है पर न्याय नहीं

Varanasi Updated Fri, 31 Aug 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। इस देश में न्यायपालिका तो है लेकिन न्याय के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। अगर न्याय होता तो नक्सलवाद की समस्या इतनी विकराल न हुई होती। वर्ष 1971 में सिर्फ 19 जिले नक्सलवाद से ग्रस्त थे, आज ऐसे जिलों की संख्या 270 तक पहुंच गई है। ये बातें पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने गुरुवार को डीएवी डिग्री कालेज में आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि कहीं।
भारत की वर्तमान चुनौतियां एवं समाधान विषय पर आयोजित संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि देश में प्रजातांत्रिक संस्थाओं को ध्वस्त करने की कोशिशें तेजी से चल रही हैं। इसी का दुष्परिणाम है कि प्रजातंत्र सिर्फ चुनावी प्रक्रिया तक सीमित होकर रह गया है। खोए प्रजातंत्र को फिर से खोजने और उसकी गरिमा लौटाने की जिम्मेदारी युवाओं पर ही है। उन्होंने कहा कि कम कमाने वालों की कमाई जहां की तहां है लेकिन अधिक कमाने वालों की कमाई बढ़ती जा रही है। देश की जीडीपी तो बढ़ गई लेकिन गरीब आदमी की गरीबी अपनी जगह रह गई। खेतिहर मजदूरों की स्थिति, भ्रष्टाचार के सर्वव्यापी हो चुके स्वरूप पर भी विभिन्न कोणों से प्रकाश डाला। लगभग एक घंटे के भाषण के दौरान उन्होेंने कालेधन की वापसी, आगामी चुनाव में अच्छी छवि वालों को जिताने से लेकर नागरिकों के कर्तव्य तक पर चरचा की।
पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त डा. ओपी केजरीवाल की अध्यक्षता में हुई संगोष्ठी में मेजर जनरल एनपी सिंह, विशिष्ट अतिथि चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारती ने भी विचार व्यक्त किए। आरंभ में प्राचार्य डा. सत्यदेव सिंह ने आगतों का स्वागत किया। डा. अनूप मिश्र के संचालन में हुई संगोष्ठी के समापन सत्र में प्रशभनोत्तरी भी हुई। किशोर झा, मनीष पांडेय, हिमांशु तिवारी, देवव्रत शर्मा, उमेश सिंह, अदिति मिश्रा, आशीष सिंह एवं रूबी खान ने अपनी जिज्ञासा जनरल वीके सिंह के समक्ष रखी। धन्यवाद ज्ञापन एसएन पांडेय ने किया।

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