सितार और वायलिन में खूब हुई नोकझोंक

Varanasi Updated Mon, 27 Aug 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। तबला सम्राट पं. किशन महाराज की याद में रविवार की शाम बनारस घराने के केंद्र कबीरचौरा गायन, वादन की गंगा बह निकली। सितार और वायलिन की युगलबंदी के बाद पद्मविभूषण राजन-साजन की शिष्या दिव्या ने एक से बढ़कर एक बंदिशें पेश कीं। श्री काशी संगीत समाज एवं संगीत संकल्प संस्था के संयुक्त तत्वावधान में किशन महाराज की स्मृति में बने सरस्वती कक्ष में यह राष्ट्रीय संगीत संध्या अनुरंजनी देर रात तक चली।
सरस्वती प्रतिमा पर राधेकृष्ण अग्रवाल और मंजू वर्मा ने माल्यार्पण कर इस महफिल की शुरुआत की। अनुरंजनी का आगाज शारदा पसन दास की वायलिन और अंजली शर्मा के सितार पर युगलबंजी से हुआ। दोनों वाद्यों में नोकझोंक का कोई जोड़ नहीं था। तबले पर सुमितराम डोहकर थे। सबसे पहले राग विहाग में अवतारणा की गई। समापन भजन की धुन पायो जी मैंने राम रतन धन पायो...से हुआ। इनके बाद जयपुर से आई राजन सादन की शिष्या दिव्या शर्मा ने राग जोग में विलंवित रचना से की। बंदिश के बोल थे- बालम ना आए सगरी रैन...। इसके बाद मध्य लय तीन ताल में साजन मोरे घर आए...। फिर द्रुत एक ताल में सजन कासे कहूं ...की प्रस्तुति की। इसके बाद दिव्या ने अपने गुरु घराने के नाम राग हंस ध्वनि में विघ्न हरन गज बदन गजानन.. के बोल पर तराना प्रस्तुत किया। तबले पर ललित कुमार, हारमोनियम पर इंद्रदेव चौधरी ने संगत की। स्वागत राजेश जैन और अंजलि महाराज ने किया। संचालन विवेक जैन ने किया।

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