जन आंदोलनों को कमजोर करने में लगीं सरकारें

Varanasi Updated Sun, 26 Aug 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। सरकारें जन आंदोलनों को कमजोर करने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं। औद्योगिक घरानों के इशारे पर नीतियों का निर्धारण किया जा रहा है। ये बातें स्वैच्छिक संगठनों के नेटवर्क इंडियन सोशल एक्शन फोरम (इंसाफ) की राज्य कार्यशाला में पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष चितरंजन सिंह ने कहीं। इसमें बलिया, जौनपुर, गोरखपुर, देवरिया, वाराणसी, इलाहाबाद, फतेहपुर, जालौन, पीलीभीत, चित्रकूट के समाज संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
पटेल धर्मशाला में आयोजित कार्यशाला में उन्होंने कहा कि जनता के हितों के लिए लड़ने वालों का उत्पीड़न किया जा रहा है। उन पर देशद्रोह तक के मुकदमे किए जा रहे हैं। विनायक सेन और सीमा आजाद पर कार्रवाई इसके उदाहरण हैं। ग्राम्या संस्थान की बिंदू ने नौगढ़ के आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों और आंदोलनों का विवरण उदाहरण सहित प्रस्तुत किया। इंसाफ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य पत्रकार उत्कर्ष सिन्हा ने कहा कि बाजारीकरण के दौर में मीडिया भी अछूता नहीं है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन तो मीडिया में छाए रहते हैं लेकिन सोनभद्र, झारखंड जैसे सुदूर इलाकों के जमीनी आंदोलनों को बारे में आमजन को जानकारियां नहीं मिल पाती हैं। मानवाधिकार एवं जन निगरानी समिति की श्रुति नागवंशी ने कहा कि शीतल पेय कंपनियां सामाजिक सरोकार के तहत जल संरक्षक का भी कार्यक्रम चला रही हैं और भरपूर जल दोहन भी कर रही हैं। यह दोहरा चरित्र है। संचालन राघवेंद्र प्रताप शाही और धन्यवाद ज्ञापन आजमा अजीज ने किया।

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