बुद्धि से उपजने वाली अभाव की कविता ही समकालीन

Varanasi Updated Sat, 25 Aug 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। कविता देशकाल परिस्थितियों का आईना होती है। काव्य का चरित्र मनुष्य की जिजीविषा को बढ़ाने वाला होना चाहिए। सनातन काल से काव्य का यह चरित्र एकरस रहा है। इस चरित्र की कसौटी पर जो कविता होगी, वही सफल होगी। इस कसौटी पर समकालीन कविता निराश करती है। बुद्धि के द्वारा उपजती है। विचारों से पोषित होती है और अधिक से अधिक बुद्धि तक ही पहुंच होती है। हृदय से समकालीन कविता का नाता नहीं होता। यह अभाव की कविता है। जहां भाव नहीं होता, वहां अभाव होता है। कविता में अभावों का रोना नहीं रोना चाहिए।
साहित्यकार डॉ. जितेंद्रनाथ मिश्र ने कहा कि कविता में अभावों का रोना बंद होना चाहिए। संक्रमण के मौजूदा दौर में समाज को काव्य सृजन से बेहद उम्मीदें हैं। ऐसे में रचनात्मक और भावपूर्ण काव्य चरित्र ही बदलाव का माध्यम बन सकता है। शुक्रवार की शाम पराड़कर भवन में आकाशवाणी के स्वर्ण जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित बदलते समय और समकालीन काव्य चरित्र विषयक संगोष्ठी में काव्य परिदृश्य पर विस्तार से रोशनी डाली गई। इसमें पटना से डॉ. अरुण कमल, दिल्ली से मदन कश्यप, डॉ. बृजेंद्र त्रिपाठी ने हिस्सा लिया। नीरजा माधव, राम सुधार सिंह समेत तमाम लोगों ने विचार व्यक्त किए।

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