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सुनिए गौर से, नौजवान बोलेंगे डायलाग

Varanasi Updated Tue, 21 Aug 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। ‘अरे तुम लौट आए.......मेरा सुमन कहा हैं......सुमन...सुमन।’ नागरी नाटक मंडली प्रेक्षागृह में कविवर रविंद्र नाथ टैगोर की रचना मुक्तधारा के संवादों की अदायगी नौजवान कर रहे हैं। निर्देशक डा. संजय मेहता बीच में टोकते हैं, ज्योति थोड़ा और पाज के साथ बोलो। थोड़ी और एनर्जी लाओ। हिंदी रंगमंच और पारसी थिएटर के स्तंभ आगा हश्र कश्मीरी की जन्मभूमि में युवा एक बार फिर थिएटर को नया रंगरूप देने के संकल्प के साथ हर साल रंगकर्म की विधा सीखने आते हैं। यह दीगर बात है कि रंगमंच की हालत ठीक नहीं होने के कारण उनको प्रतिभा को निखारने के भरपूर मौके नहीं मिल पा रहे हैं।
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कैंटोमेंट स्थित नाचघर में तीन अप्रैल 1868 को जानकी मंगल का मंचन होना था। ऐन मौके पर लक्ष्मण की भूमिका निभाने वाला पात्र बीमार हो गया। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र को काशी नरेश ने लक्ष्मण बनने का प्रस्ताव दिया और बोले कि सोच लो शो होने में महज दो घंटे बचे हैं। भारतेंदु बाबू ने इतनी ही देर में पूरा नाटक कंठाग्र करके सुना दिया। यह हिंदी रंगमंच का प्रस्थान बिंदु माना जाता है। बनारस में जन्मे आगा हश्र कश्मीरी लिखित नाटकों की पारसी थिएटर में धूम मची। बीवी कारंत जैसे दिग्गजों ने यहां के कलाकारों के साथ नाटक का मंचन किया था। पर रंगमंच बुलंदियों से गिरने लगा और पिछले एक दशक में सन्नाटा ज्यादा ही गहरा हो गया। अब युवाओं की नई पौध इसे तोड़ने में लगी है। नागरी नाटक मंडली और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सहयोग से हर साल नए कलाकारों के तैयार करता है। मंडली की ओर से सितंबर के प्रथम सप्ताह में आयोजित आश्विन नाट्य महोत्सव करने जा रही है। इसके लिए संजय मेहता के निर्देशन में मुक्तधारा की तैयारी हो रही है। इसमें एमए में पढ़ने वाले लक्ष्मण, एमकाम के आदित्य, एमए की ज्योति यादव, इंटरमीडिएट के दीपक यादव एवं उत्कर्ष श्रीवास्तव आदि नवांकुर अभिनय का पूर्वाभ्यास कर रहे हैं। शहर में 200 से ज्यादा युवा रंगकर्मी हैं। अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग आफ वासेपुर में 300 लोगों ने काम किया, जिसमें 25 कलाकार ठीक से दिखाई दिए। रंगकर्मी विपुल कृष्ण नागर का कहना है कि कामायनी और सेतु सक्रिय हैं। एकदंत, नाट्यांकुर, दशरूपक जैसी आधा दर्जन संस्थाएं पहचान बनाने में लगी हैं। युवा कलाकारों की भी कमी नहीं है लेकिन नाटक मंचित नहीं होने के कारण उनके पास सीखने और करने का अवसर नहीं है। डा. मेहता का कहना है कि मंडली हर महीने मंचन की योजना बना रही है।

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