गंावों में श्रमिकों की संख्या बढ़ी, रोजगार नहीं

Varanasi Updated Sun, 19 Aug 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। बढ़ती आबादी अपने साथ तमाम मुश्किलें लाती है। इन्हीं में से एक है बेरोजगारी। गांवों में यह समस्या और जटिल होती जा रही है। केंद्र सरकार ने इस समस्या को दूर करने के लिए मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना शुरू की। शुरुआत में तो ग्रामीणों में बेहतरी की आस जगी लेकिन बाद में ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की...’ वाला हाल हो गया। मनरेगा के चलते गांवों में मजदूरों की संख्या बढ़ गई लेकिन उस अनुपात में उनको रोजगार नहीं मिल पा रहा है।
पूर्वांचल के गांवों में पिछले दो साल में मजदूरों की संख्या में लगभग 60 फीसदी का इजाफा हुआ है। इनको महीने भर काम नहीं मिल पा रहा। वहीं बड़े काश्तकारों को कृषि कार्य के लिए मजदूर नहीं मिल रहे क्योंकि इसके एवज में मांगी जाने वाली मजदूरी देना काश्तकारों पर भारी पड़ रहा है।
गांवों में गहराती जा रही इस समस्या के संबंध में भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय महासचिव बैजनाथ राय ने कहा कि गांवों में ही रोजगार के साधन विकसित किए जाने चाहिए। ग्रामीण श्रमिकों को प्रतिदिन रोजगार और सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी दी जानी चाहिए। साथ ही मनरेगा पर भी पुनर्विचार कर इसमें परिवर्तन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि गांवों में रोजगार उपलब्ध नहीं कराया गया तो मजदूरों का पलायन शहर की ओर बढ़ेगा। सरकार को गांवों में ही छोटी-छोटी औद्योगिक इकाइयां खोलनी चाहिए। कुटीर एवं पारंपरिक उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। साथ ही मनरेगा को कृषि कार्य के साथ जोड़ना चाहिए।

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