काशी का आविर्भाव दिवस है अघोर चतुर्दशी

Varanasi Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। वह काशी जिसे राजा दिवोदास से वापस पाने के लिए भगवान शिव ने क्या-क्या नहीं किया? अपनी ही रची काशी को अपने अनुकूल बनाने के लिए उन्होंने चौसठ योगिनियों को भेजा। पर वे धर्मनिष्ठ दिवोदास के राज्य में विघ्न न डाल सकीं। फिर सेनापति के रूप में चिंतामणि स्वरूप में भगवान गणेश को भेजा। जिस काशी का आकर्षण भगवान सूर्य को भी मोहित कर गया। ऐसी मोहक काशी का सृजन भगवान शंकर ने अघोर चतुर्दशी के दिन किया था। यह तिथि इस वर्ष 16 अगस्त को है।
मिस्र और रोम की सभ्याताओं से भी प्राचीन मानी जाने वाली काशी नगरी को लेकर धार्मिक मान्यता है कि यह धरती पर नहीं अपितु भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी है। हमारे धर्म ग्रंथ भी इसकी प्राचीनता के बहुतेरे प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। समस्त देवों के काशी के प्रति मोह के कई कारणों में एक और प्रधान कारण राग-रागिनी भी हैं। अघोर चतुर्दशी के संधिकाल में महाश्मशान भूमि के आविर्भाव के साथ ही छह राग और तीस रागिनियां भी अस्तित्व में आईं। मूल रूप से ये राग-रागिनियां सृष्टि की संजीवनी शक्ति हैं। छह रागों में राग दीपक, रागश्री , मालकौस, हिंडोला, भैरव और मेघ शामिल हैं। इनमें से प्रथम पांच रागों का केंद्र स्वयं नटराज हैं तो छठे राग की प्राप्ति देवी पार्वती से होती है। पं. रामेश्वरनाथ ओझा के अनुसार सामवेद में उल्लेख है कि प्रथम मनवंतर में भगवान शंकर ने महाश्मशान भूमि काशी की उत्पत्ति की थी। वैदिक गणना के अनुसार एक मनवंतर एक करोड़ वर्ष का होता है। इस समय 14वां मनवंतर जारी है। इस दृष्टि से 14 सौ करोड़ वर्ष पूर्व काशी अस्तित्व में आई थी।

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