अखाड़े में पछाड़ा तो बढ़ गया जोश

Varanasi Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। लगातार दो ओलंपिक (बीजिंग और लंदन) में देश के लिए कुश्ती में पदक जीतकर सुशील कुमार उन युवाओं के रोल मॉडल बन गए हैं, जो खेल में अपना कॅरिअर बना रहे हैं। लंदन में सुशील भले ही स्वर्ण पदक नहीं जीत सके मगर रजत पदक जीतकर ही उन्होंने इतिहास रच दिया है। सतपाल के इस शिष्य ने 2008 के बीजिंग ओलंपिक में देश को कांस्य पदक दिलाया था। पूर्व पहलवान हों या कुश्ती संघों में काबिज लोग सभी का मानना है कि लंदन ओलंपिक में भारतीय पहलवानों के चमकदार प्रदर्शन का असर युवा मल्लों पर पड़ेगा।
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पूर्व अंतरराष्ट्रीय पहलवान मेवालाल यादव कहते हैं कि लंदन में सुशील और योगेश्वर से सभी को पदक की उम्मीद थी। दोनों ही पहलवान उम्मीदों पर खरा उतरे। अमित कुमार और नरसिंह यादव दोनों का ही यह पहला ओलंपिक था। दोनों आने वाले सालों में देश के लिए ओलंपिक मेडल जरूर जीतेंगे। वहीं, जिला कु श्ती संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राजीव सिंह ‘रानू’ ने कहा कि सुशील ने पूरी दुनिया में भारतीय कुश्ती का मान बढ़ाया है। वह सही मायने में भारत के रत्न हैं। युवा पहलवान उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। ओलंपिक पदक से भारतीय कुश्ती को एक नई पहचान मिलेगी। ज्यादा से ज्यादा युवा इस खेल की ओर आकर्षित होंगे। उधर, अंतरराष्ट्रीय पहलवान जमुना यादव ने कहा कि कुश्ती बहुत महंगा खेल है। कुश्ती को प्रोत्साहन देने के लिए देश के बड़े औद्योगिक घरानों को भी आगे आना चाहिए। देश को दर्जन भर से अधिक अंतरराष्ट्रीय पहलवान दे चुके उस्ताद मनोहर पहलवान मानते हैं कि सुशील और योगेश्वर की जीत मील का पत्थर साबित होगी।
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