मेलबर्न ओलंपिक में दिखा था चिक्कन पहलवान का जलवा

Varanasi Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। काशी की कुश्ती कला को राष्ट्रमंडल खेलों, एशियन गेम्स और ओलंपिक में प्रदर्शित कर विश्व भर में वाहवाही बटोरने वाले लक्ष्मीकांत पांडेय उर्फ चिक्कन पहलवान की जितनी भी तारीफ की जाए कम है। कोईरीपुर खुर्द गांव (बड़ागांव) के ब्राह्मण परिवार में चिक्कन पहलवान का जन्म 1936 में हुआ था। पिता रामनरेश पांडेय, चाचा बलभद्र पांडेय, दीपनारायण और सरबजीत पांडेय नामी पहलवान थे। पहलवानों के खानदान से होने के नाते चिक्कन को भी अपने परिवार के अखाड़े में लोटपोट करने की धुन सवार थी। चाचा सरबजीत का उन पर ज्यादा स्नेह था। उन्होंने ही चिक्कन को कलाकारी की कुश्ती में पारंगत किया था।
चिक्कन अपने गुरु स्वामी वीतरागानंद सरस्वती के आशीर्वाद एवं उनके द्वारा दी गई भस्म को कुश्ती लड़ने से पूर्व शरीर पर लगाया करते थे, जिसका विरोध पंजाब और सेना के पहलवानों ने एक बार किया था। गुप्तेश्वर मिश्र और अनंतराम भार्गव से ओलंपिक शैली की कुश्ती सीखने वाले चिक्कन पहलवान 1956 से 1961 तक लगातार राष्ट्रीय चैंपियन रहे। इस दौरान उन्होंने सूरजभान, लालता, कुल्हण, शामी, मेहर सिंह, रामधन, भीम सिंह, वीजी खासित, हरवेल सिंह, कल्लू और ज्ञान जैसे ख्यातिलब्ध पहलवानों पर जीत दर्ज की। लक्ष्मीकांत 1956 से 64 तक लाइट और वेल्टरवेट में यूपी चैंपियन रहे। इस दौरान यूपी केशरी का सम्मान हासिल कर उन्होंने काशी का गौरव बढ़ाया। 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में कनाडा के हैवीवेट के पहलवान से अभ्यास के दरम्यान उन्होंने उसे ऐसी मुल्तानी मारी कि वह बोरे के समान काफी ऊपर से गद्दे पर चारों खाने चित गिरा। गद्दे की कुश्ती का कम अनुभव होने के कारण विश्व के चुनिंदा पहलवानों से लाइट वेट में जमकर मुकाबला लेने के बावजूद चिक्कन मेलबर्न ओलंपिक में कोई पदक नहीं प्राप्त कर सके। 1962 के बैंकाक एशियन गेम्स में उन्होंने भारत के लिए कांस्य पदक जीता था। चिक्कन पहलवान ने बेनियाबाग के राम सिंह अखाड़ा के उस्ताद राम सिंह को अपना गुरु बनाया। 1956 में यूपी पुलिस से जुड़ने वाले चिक्कन ने 1990 में डीएसपी फैजाबाद के पद से अवकाश ग्रहण किया। रिटायरमेंट के नौ साल बाद छह दिसंबर को यह पहलवान दुनिया से रुखसत हो गया।

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