अखाड़े में जाना अपमान समझता है युवा

Varanasi Updated Mon, 23 Jul 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। काशी में कभी विशुद्ध रूप से अखाड़ेबाजों का त्यौहार रहे नागपंचमी का स्वरूप अब बदलने लगा है। अखाड़े सिमटने लगे हैं तो शरीर सौष्ठव से जुड़े इस त्यौहार का रुख जिमों की ओर होने लगा है। काशी में बचे रह गए मिट्टी के अखाड़ों पर जोड़ी, गदा और डंबल का पूजन तो होगा ही, शहर के जिमों में जाकर शरीर सौष्ठव करने वाले युवा परंपरागत त्यौहार को अपने अंदाज में मनाएंगे।
बीते 30 वर्षों से मिट्टी के अखाड़े में पहलवानी कर रहे गिरजाघर निवासी संजय यादव कहते हैं, कभी इसी शहर में गली-मोहल्लों में अखाड़े हुआ करते थे। अब मिट्टी के अखाड़े गिनती के रह गए हैं। इसका बहुत दुष्प्रभाव नागपंचमी के पर्व पर पड़ रहा है। लोग सिर्फ नाग की पूजा की औपचारिकता तक सिमटते जा रहे हैं। कुश्ती कला पर तो ग्रहण ही लग गया। आजाद व्यायामशाला के रामधन प्रसाद कहते हैं, आज के दौर के किशोर अखाड़े में आना अपनी बेइज्जती समझते हैं। उन्हें लगता है जिम ही सबसे सही और समाज में प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला है। बीते एक दशक से लगातार जिम में जाकर शरीर सौष्ठव करने वाला अचल कुमार सिंह कहते हैं कि नाग पंचमी का दिन मल्ल कला में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों की पूजा का दिन है। इसलिए हम लोग नागपंचमी के दिन अपने जिम के उपकरणों का पूजन करते हैं। गद्दे की कुश्ती के माहिर वैभव वर्मा के अनुसार, बदलते समय के साथ खुद को और तौरतरीकों का बदलते रहना चाहिए। इससे हम नई चीजों को अपनाते जाते हैं और पुरानी चीजें भी हमारे साथ बनी रहती हैं।

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