पूर्णांबा को नहीं पचा पानी, फूट-फूट कर रोईं

Varanasi Updated Sat, 30 Jun 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। कबीरचौरा अस्पताल में तपस्या वापसी के वक्त भावुक माहौल देख लोगों की आंखें छलछला उठीं। जल से भरा मिट्टी का पुरवा शंकराचार्य के हाथ से थामने में साध्वी पूर्णांबा के हाथ कांपने लगे। जल की घूंट लेते ही वह फूट-फूट कर रो पड़ीं। उल्टी होने और हालत बिगड़ने की वजह से उन्हें चिकित्सकों की निगरानी में तत्काल वार्ड में ले जाया गया। शंकराचार्य ने पूर्णांबा की प्राण रक्षा के लिए उनके वार्ड में जाकर मंत्रोच्चार भी किया। यहां सात तपस्वियों को जल पिलाते समय माहौल बेहद भावुक हो गया था। ब्रह्मचारी कृष्णप्रियानंद भी गुरु के आगे आंखों के आंसू नहीं रोक सके। तपस्वी वार्ड में सभी सात तपस्वियों को ड्रिप के साथ एक कतार में ह्वील चेयर पर लाया गया था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पुरवा में जल भरकर शंकराचार्य को थमा रहे थे। पूर्णांबा गुरु के चरण की ओर झुक रही थीं। सबसे पहले उन्हें शंकराचार्य ने जल पिलाया और वह भावुक होकर रो पड़ीं। साध्वी के शरीर में तेज कंपन होने की वजह से चिकित्सकों को बुलाया गया। सीएमएस डॉ. डीबी सिंह के नेतृत्व में उनका उपचार किया गया, तब हालत सामान्य हो सकी। शंकराचार्य और कोयला मंत्री ने साध्वी शारदांबा, ब्रह्मचारी कृष्णप्रियानंद, योगेश्वरानंद, शिवमोहन, प्रमोद माझी को बारी-बारी से जल पिलाया। गंगा प्रेमी भिक्षु की तलाश हो रही थी। वह पहुंचे और उन्हें जल दिया गया तो उन्होंने कटोरे में भरकर रख लिया। कुछ देर बाद जब शंकराचार्य को बताया गया कि भिक्षु जी ने जल नहीं पिया तो वह पूछ बैठे। इस पर भिक्षु बाबा ने शंकराचार्य के चरणामृत को पीकर तपस्या पूरी की।
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