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सर सुंदर लाल अस्पताल का हालः अंदर दवा नहीं, बाहर दलाल हावी

Varanasi Updated Tue, 26 Jun 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। पूर्वांचल ही नहीं बिहार तक के मरीजों का इलाज कर रहे बीएचयू के सर सुंदर लाल अस्पताल में मरीजों के तीमारदार दवा के लिए भटक रहे हैं। अस्पताल परिसर में बोर्ड तो टंगा है ‘24 घंटे दवा उपलब्ध’ पर हालत यह है कि ज्यादातर जरूरी दवाएं मिलती ही नहीं। ऐसे में मजबूर मरीजों के परिजन जब बाहर जाते हैं तो उन्हें सस्ती दवा दिलाने का लालच देकर दलाल खींचने लगते हैं। जो उनके झांसे में आ गया उसे तो चूना लगता ही है, जो नहीं आया उसे भी महंगी दवा खरीदने को बाध्य होना पड़ता है। दवा का टोटा छह माह से चल रहा है, मगर अस्पताल प्रशासन ने अब तक इसे संज्ञान में लिया ही नहीं।
सर सुंदर लाल अस्पताल प्रशासन ने परिसर में दवा की एक बड़ी दुकान का ठेका दे रखा है, लेकिन वहां की दुर्व्यवस्था देखकर तो यही लगता है कि उसे कोई देखने वाला नहीं है। सुबह हो या शाम दवा की दुकान के कई काउंटर खुलते ही नहीं। जो खुलते हैं वहां लाइन लगाकर इंतजार कर रहे मरीजों के परिजनों का जब नंबर आता है तो कह दिया जाता है कि दवा नहीं है। खासकर कैंसर की दवा का वहां नितांत अभाव है। ऐसे में परिजनों का वक्त ही नहीं बर्बाद होता बल्कि आर्थिक चपत भी लगती है। दिन में महंगी ही सही दवा बाहर मिल जाती है, लेकिन रात में जब बाहर की दुकानें बंद रहती हैं तो मरीजों को कितनी दिक्कत होती होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
इस बाबत परिसर स्थित दुकान के प्रबंधक सुनील कुमार का कहना था कि जो दवाएं हमारे पास नहीं होतीं, उन्हें बाजार से मंगवाकर दिया जाता है, लेकिन वक्त ज्यादा लगने से मरीज या उनके परिजन इंतजार नहीं करते। जब उनसे पूछा गया कि गंभीर रोगाें की दवाएं क्याें नहीं मिल पातीं तो वह माकूल जवाब नहीं दे पाए। इस संबंध में अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. यूएस द्विवेदी से जब पूछा गया तो उन्होंने भी कुछ कहने से इंकार कर दिया, जबकि अस्पताल प्रबंधन से जुडे़ एक अधिकारी ने नाम न छापने के अनुरोध पर बताया कि कई माह से दुकान संचालक को दवा रखने को कहा जा रहा है, लेकिन वह मनमानी कर रहा है। अस्पताल परिसर में दुकान इसलिए खुलवाई गई थी कि मरीजाें को अच्छी और सस्ती दवाएं मिल सकें, लेकिन इसका लाभ नहीं मिल रहा।

केस - एक
नैनी, इलाहाबाद निवासी सुभाष अपने घर की महिला को बीएचयू अस्पताल के अंकोलाजी विभाग में दिखाने आए। डाक्टर ने उन्हीं कीमो थिरैपी के लिए दवा लाने को कहा। जब वे परिसर की दुकान में पहुंचे तो कहा गया कि दवा साढ़े नौ हजार की है। जब उन्होंने दवा की मांग की तो कुछ देर बाद कह दिया गया कि बाहर से ले लीजिए। परेशान हाल सुभाष जब सड़क पर पहुंचे तो उन्हें दलालों ने घेर लिया। जिस दवा का दाम बीएचयू में नौ-साढ़े नौ हजार रुपये बताया गया वह दवा उन्हें बाजार से 15 हजार में लेनी पड़ी।

केस - दो
इलाहाबाद के ही रघुराज को डाक्टर ने मुंह में हुए घाव की बायोप्सी कराने को कहा। जब उनके परिजन इंजेक्शन, ग्लब्स, सीरींज लेने अस्पताल परिसर की दुकान में पहुंचे तो पर्चा यह कहकर वापस कर दिया गया कि दवा नहीं है। अंतत: उन्होंने बाहर से ज्यादा पैसे देकर दवा खरीदकर काम चलाया।

कोट
अस्पताल की दुकान से दवा की किल्लत जल्द दूर करा दी जाएगी। इस मामले को मैं अपने स्तर से भी देखूंगा। इसके अलावा मेडिकल सुपरिटेंडेंट स्तर से भी ऐसी व्यवस्था कराई जाएगी ताकि किसी भी कीमत पर मरीजों को दवा मिले। वैसे एक माह के अंदर बीएचयू प्रशासन ऐसी व्यवस्था करने जा रहा है जिससे मरीजों को दिक्कत नहीं उठानी पड़ेगी-प्रो. टीएम महापात्रा, चिकित्सा विज्ञान संस्थान के निदेशक

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