अविरलता की जंग में बनारस घराने ने रचा इतिहास

Varanasi Updated Wed, 13 Jun 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। संगीत की दुनिया में पीढि़यों से शोहरत का झंडा गाड़ते आ रहे बनारस घराने के कलाकारों ने गंगा की अविरलता के लिए मंगलवार को नायाब प्रस्तुति से इतिहास रच दिया। एक-दो -चार नहीं बल्कि एक साथ शृंखलाबद्ध 151 कलाकार गंगा मुक्ति की प्रतिज्ञा लेकर स्वरांजलि देने उसी तट पर पहुंचे जिसके पटने, सूखने की चिंता ने पूरे देश को झकझोर दिया है। काशी में यह पहला मौका था जब इतनी बड़ी तादाद में कलाकार गंगा की जंग में साज लेकर कूद पड़े। बांध परियोजनाओं से पतित पावनी को मुक्त कराने के लिए साधु-संतों की तपस्या के 151 दिन पूरे होने पर शंकराचार्य घाट पर यह स्वरनाद हर किसी के लिए यादगार बन गया।
प्रसिद्ध सितार वादक पं. शिवनाथ मिश्र के निर्देशन में सुर-लय-ताल का यह संगम राग देस में हुआ। दीपचंदी ताल में निबद्ध बंदिश ‘देवि सुरेश्वरि भगवति गंगे/त्रिभुवन तारनि तरल तरंगे...’ के बोल पर कंपोज की गई थी। युवा सितार वादक डॉ. देवव्रत मिश्र के सह निर्देशन में एक साथ 108 सितार झंकृत हो उठे। सभी कलाकार सफेद कुर्ता, पाजामा में थे। काशी हिंदू विश्व विद्यालय के मंच कला संकाय के अलावा बसंता कालेज, आर्य महिला डिग्री कालेज, सनबीम लहरतारा, सनबीम वरुणा के कलाकारों ने ताल साधना की। पोलैंड और पुर्तगाल के दो विदेशी कलाकार भी इस अभियान के सहभागी बने। शहनाई सम्राट भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के पुत्र नाजिम हुसैन समेत 43 कलाकार तबले पर संगत कर रहे थे। घाट की बालकनीनुमा सीढि़यों पर आठ पंक्ति में शृंखलाबद्ध कलाकार देखते बन रहे थे। पहली कतार में राकेश कुमार और सुनील प्रसन्ना ने जहां बांसुरी पर गंगा स्तुति को मोहक बनाने में कसर नहीं छोड़ी, वहीं पं. शिवनाथ मिश्र पतित पावनी के स्तोत्र को खुद स्वर देकर सजा रहे थे। अलाप, जोड़, झाला के बाद बनारस घराने की तिहाइयां भी एक से बढ़कर एक प्रयोगों के साथ बजने लगीं तो दर्शक दीर्घा में देश-दुनिया के तमाम संगीत प्रेमी और साधक उन क्षणों को आत्मसात करने के साथ ही उसे कैमरे में कैद करने की होड़ में जुटे रहे। हिमालय की तरह दृढ़निश्चयी कलकारों का मन कभी उन्मुक्त लहरों की तरह मचलता नजर आया तो कभी सुर, लय ताल के संगम में समर्पित होकर पतित पावनी के लिए तन-मन से न्योछावर होने को आतुर दिखा। सबसे बड़ी बात यह थी कि कलाकारों का यह जमावड़ा स्वत: स्फूर्त चेतना पर आधारित बिना किसी पारिश्रमिक के हुआ। गंगा सेवा अभियानम के सार्वभौम संयोजक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की मौजूदगी में कलकारों को दुपट्टा ओढ़ाया गया। इस मौके पर महामंडलेश्वर संतोष दास भी उपस्थित थे।

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