विस्फोट के सवाल पर प्रमुख सचिव अटके

Varanasi Updated Mon, 11 Jun 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। चार बार आतंकी बम विस्फोट की मार झेल चुके बनारस के लिए चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम तो दूर दशाश्वमेध घाट पर 2005 में हुए धमाके के बारे में सवाल करने पर प्रमुख सचिव अटक गए। तत्कालीन पुलिस ने इस मामले पर पर्दा डालने के लिए सिलेंडर विस्फोट बता कर घाट की सफाई करवा दी थी। एक साल बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर उसकी जांच कराई गई थी। मगर बार-बार याद दिलाने पर भी प्रमुख सचिव को यह विस्फोट याद नहीं आया।
दशाश्वमेध घाट पर 23 मार्च 2005 को विस्फोट हुआ था। इसमें 12 लोग मारे गए थे और दो दर्जन घायल हुए थे। पुलिस ने बिना किसी जांच के घाट की सफाई करवा दी। प्रकरण को सिलेंडर विस्फोट घोषित कर दिया। जानकारों के मुताबिक इसी दिन डेढ़सी पुल के पास एक पुलिस वाले को 15 किलो का स्टील का कंटेनर मिला था। वह उसे लेकर कोतवाली गया। पांच दिन बाद जब उसने कंटेनर को खोला तो उसमें तार दिखाई दिए। आनन-फानन में पुलिस उसे लेकर गंगा पार गई और लेजर से उसे निष्क्रिय किया गया। उसमें आरडीएक्स पाया गया था। इसके बाद भी पुलिस ने दशाश्वमेध घाट पर बम विस्फोट की बात स्वीकार नहीं की। इसी अनुभव के आधार पर क्षेत्रीय नागरिकों ने सात मार्च 2006 को दशाश्वमेध पर मिले बम को खुद ही डिस्पोज कर दिया था जबकि संकटमोचन और कैंट स्टेशन पर हुए ब्लास्ट में 17 लोग मारे गए थे। मुआयना करने आए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के सामने दशाश्वमेध घाट पर हुए विस्फोट की बात कही गई। उन्होंने उसकी जांच कराने के निर्देश दिए। तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह ने मामले की जांच कराई और आरडीएक्स से विस्फोट की बात साबित हुई थी। बाद में इसकी फाइल दाखिल दफ्तर कर दी गई। उसके बाद नवंबर 2007 में को कचहरी में हुए विस्फोट में 10 लोग मारे गए और शीतला घाट पर सात दिसंबर 2010 में विस्फोट में दो लोगों की जानें गईं। दशाश्वमेध विस्फोट के बारे में बात करने पर प्रमुख सचिव गृह आरएम श्रीवास्तव अटक गए। उन्होंने संकटमोचन विस्फोट की बात कहनी शुरू कर दी। उनको बार-बार याद दिलाया गया लेकिन घटना याद नहीं आई। लापरवाह अफसरों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर उसकी प्रगति के बारे में वह कुछ नहीं बता पाए। दशाश्वमेध में बम विस्फोट प्रमाणित नहीं होने के कारण पीडि़तों को मुआवजा तक नहीं मिला है।

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