फूलों से महकी, रोशनी से नहाई सुरों की शाम

Varanasi Updated Thu, 07 Jun 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। धन्यवाद, शुक्रिया, मेहरबानी...मेरे और मेेरे साथ आए साथियों की ओर से। भोले की नगरी में तीस साल पुरानी पहली बार की महकती यादों को लिए यह अल्फाज थे गलज गायकी की दुनिया के मशहूर फनकार पंकज उधास के। बड़े अदब, तहजीब और खुशमिजाजी के साथ वह सलीके से डायस पर आए और गजलों के एक-एक शेर सुरों में संवाकर हर किसी के जेहनो दिल में उतर कर महफिल में छा गए। गुलाब, रजनीगंधा के फूलों के अलावा लतर की रोशनी से सजी यह खुशनुमा शाम बनारस क्लब में आयोजित की गई थी।
सुनहरे गुलदस्ते के सामने अफसरों, शहर की जानी मानी हस्तियों के साथ पंकज उधास ने दीप जलाया। बनारस क्लब के अध्यक्ष कमिश्नर चंचल तिवारी, जिलाधिकारी समीर वर्मा, डीआईजी ए सतीश गणेश, एसएसपी बीडी पालसन की मौजूदगी में खैरमकदम के बाद उन्हें संकट मोचन का स्मृति चिह्न भेंट किया गया। जगह-जगह केवड़ा, गुलाब की फुहारें महफिल को खुशबुओं से तर -बतर कर रही थीं। वह बोल पड़े, आज की रात मेरी पसंदीदा गजलें और आपकी फमाइशें दोनों चलेंगी। फिर वह भीड़ से साथ देने की बात करने लगे। मोलाहजा फरमाने की पेशकश के साथ कैसरुल जाफरी का गुनगुनाने लगे। साज बज उठा। दीवारों से मिलकर सोना अच्छा लगता है, गम भी पागल हो जाएंगे ऐसा लगता है...। फिर तो गजलों फिजा बन गई। शराब, शबाब और मोहब्बत के नगमें गूंजने लगे। आपके लिए गुनाह सही हम पिएं तो शबाब बनती है, सौ गमों को निचोड़ने के बाद एक कतरा शराब बनती है...। तालियों की बौछार शुरू हुई। सबको मालूम है मैं शराबी नहीं, फिर भी कोई पिलाए तो मैं क्या करूं...। सिर्फ एक बार नजरों से नजरें मिलें ... और कसम टूट जाए तो मैं करूं...। जिएं तो जिएं कैसे बिन आपके के अलावा एक से बढ़कर एक गजलें उन्होंने पेश की। मौसम भी खुशगवार हो गया। हलकी फुहारों को नजर अंदाज कर लोग मस्ती में खोए रहे। पंकज उधास ने शेर पढ़ा लोग तुमको गुलाब कहते हैं, और जाने शबाब कहते हैं, आप जैसे हसीन चेहरों को हम खुदा की किताब कहते हैं...। आप जिनके करीब होते हैं, वो बड़े खुशनसीब होते हैं...। क्लब के सचिव एनपी सिंह ने संचालन किया।
बहुत तमाम उम्र कहां कोई साथ देता है, ये जनता हूं फिर भी कुछ साथ चलो।
इनसेट
आपके प्यार का लाख-लाख शुक्र
वाराणसी। पंकज उधास ने बनारस के मिजाज और मस्ती की जमकर तारीफ की। बताया कि जब पहली बार 1982 में आया था तब जो यहां के लोगों ने प्यार दिया वह भूलता नहीं। आपके प्यार का शुक्रगुजार हूं। आने वाले दिनों में भी सुरों-महफिलों का यह रिश्ता बने रहने की पेशकश भी उन्होंने की।

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