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कबीर-जगन्नाथ की नगरी में पान-पानी का गहरा रिश्ता

Varanasi Updated Thu, 07 Jun 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। ज्येष्ठ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ की जलयात्रा होती है। जलाभिषेक से भक्तों के प्रेम में पड़े भगवान जगन्नाथ अस्वस्थ हो जाते हैं। पखवाड़े भर विश्राम के बाद मन बहलाव के लिए यात्रा पर निकलते हैं। ओडिशा के पुरी की रथयात्रा मशहूर है। वहीं के प्रधान पुजारी स्वामीनाथ ब्रह्मचारी ने 322 साल पहले काशी में जगन्नाथ जी का मंदिर बनवाया था और रथयात्रा शुरू की थी। आज यह काशी के चार लक्खा मेलों में से पहला माना जाता है। नई फसल का जगन्नाथी पान पुरी और काशी में भगवान को चढ़ाने के बाद ही खाया जाता है। पान बनारस नहीं बल्कि ओडिशा में ही होता है पर अकल का ताला बनारस वाला पान ही खोलता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ही लहरतारा में संत कबीर का आविर्भाव हुआ, जिन्होंने पुरी में सागर के तांडव को नियंत्रित किया। यानी कबीर और जगन्नाथ की नगरी में पान और पानी का गहरा रिश्ता है।
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बनारस में पान पैदा नहीं होता। पुरी के खारे पानी में पैदा होने वाला पान पकाने की कला की वजह से बनारसी हो जाता है। रोजाना छह से 10 ट्रक तक पान यहां आता है और पकाने के बाद बाहर भेज दिया जाता है। हालांकि, अब पुरी में भी पान पकाया जाने लगा है। काशी में आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से रथयात्रा शुरू होती है। पुरी और काशी के बीच पान और पानी का गहरा रिश्ता रहा है। पुरी में सागर बहुत तांडव करता था। उसका जल पूरे नगरी को डुबा देता था। संत कबीर ने सागर तट पर कुबड़ी (दंड) गाड़ दी। तब से सागर ने उस सीमा का अतिक्रमण नहीं किया। उस जगह पर कबीरचौरा मठ की एक शाखा है। वहां 10 फुट गहराई में कुबड़ी गड़ी हुई है। यह कथा पूरे ओडिशा में प्रचलित है। कबीरचौरा मूलगादी मठ के पीठाधीश्वर संत विवेक दास आचार्य इस कथा की पुष्टि करते हैं। उन्होंने रामानंद के पौत्र शिष्य अनंत दास की पुस्तक कबीर परिचई के हवाले से बताया कि और भी किस्से हैं, जिनसे पुरी से कबीर के रिश्तों का पता चलता है। कबीर साहब की ख्याति सुनकर काशी नरेश वीरदेव सिंह ने उन्हें अपने यहां बुलाया था। कबीर साहब, संत रैदास के साथ राजा से मिलने राजघाट गए। उनके एक हाथ में बोतल में पानी और दूसरा हाथ एक गणिका के कंधे पर था। इसे देख सब शर्मिदिंा हो गए। सैनिकों ने कबीर को दरबार से बाहर करना शुरू किया तो बोतल गिर गई। उससे इतना पानी बाहर निकला कि सबकुछ डूब गया। राजा ने कबीर से पूछा कि इतना पानी कहां से आया। उन्होंने बताया कि जगन्नाथपुरी में रामहर्ष पंडा के घर में आग लगी थी, उसे ही बुझा रहा था। राजा को इस पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने ‘साड़नी’ की सवारी से दूत भेजकर इसका पता लगाया। वहां सचमुच आग लगी थी और संतों ने बुझाया था। राजा और रानी संत कबीर के पास गए और क्षमा मांगी। कबीरचौरा मठ में इसकी मूर्ति बनवाई गई है। असम के संत शंकर देव की वाणी ‘उरेखा वाराणसी ठामे ठांव कबीर गीत सभै जन गांवैं, तथापि फूटल आंख तारे विष्णु वैष्णव को धिक्कारे’ से भी कबीर के ओडिशा से रिश्ते का पता चलता है।
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