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तड़पते तपस्वियों को देख छलकीं शंकराचार्य की आंखें

Varanasi Updated Tue, 29 May 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। गंगा सेवा अभियानम् के राष्ट्रव्यापी आंदोलन को कामयाबी का आशीर्वाद देने के बाद सोमवार की दोपहर गोवर्धनपुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती शिवप्रसाद गुप्त मंडलीय अस्पताल पहुंचे। साधु-संतों के काफिले के साथ पुरी पीठाधीश्वर ने तपस्वियों के बीच पौन घंटे से अधिक का वक्त गुजारा। इमरजेंसी वार्ड में गंगा की खातिर जिंदगी से जूझ रहीं दो साध्वियों के अलावा तीन अन्य तपस्वियों को देखकर उनकी आंखें भर आईं। तपस्यारत कुछ संतों के चिपके पेट और रेशा-रेशा हड्डियों को देख वह कुछ देर तक बोल नहीं सके और उनका गला रुंध सा गया। बोले कि मां गंगा और बाबा विश्वनाथ की कृपा से तपस्या सफल होगी। गंगा की अविरलता बहाल कराने में वह कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। दोपहर करीब सवा एक बजे मंडलीय अस्पताल पहुंचे शंकराचार्य नीचे उतरने के बाद करीब 10 मिनट तक काशीपुरी के सुमेरुपीठाधीश्वर स्वामी चिन्मयानंद महाराज की प्रतीक्षा करते रहे। उनके आते ही दोनों शीर्ष धर्माचार्य अस्पताल में दाखिल हुए। शंकराचार्य सबसे पहले उस वार्ड में गए, जहां साध्वी शारदांबा और पूर्णांबा को ड्रिप लगाई गई थी। दोनों साध्वियों की लंबी तपस्या की अवधि जानने के बाद उन्होंने उनको ढांढस बंधाया। फिर वह सीधे तपस्वी वार्ड में गए, जहां गंगा प्रेमी भिक्षु महाराज पं. भट्ट शास्त्री से बेड पर ही लेट कर भागवत कथा सुनते मिले। हड्डियों के ढांचे के रूप में तपस्वी को देख उनकी आंखें नम हो गई। पास में ही भर्ती युवा ब्रह्मचारी कृष्णप्रियानंद का भी उन्होंने हाल जाना। इसके बाद शंकराचार्य अस्पताल की पहली मंजिल पर प्राइवेट वार्ड नंबर-10 में भर्ती बाबा नागनाथ से मिलने गए। कराहते तपस्वी ने शंकराचार्य से कहा कि वह जीते जी गोमुख से गंगा सागर तक एक बार गंगा को अविरल बहते देखना चाहते हैं। यह सुन शंकराचार्य भावुक हो उठे। यहां उनके निजी सचिव निर्विकल्पानंद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, वासुदेवाचार्य, राष्ट्रोत्कर्ष अभियान के राष्ट्रीय प्रमुख भारत भूषण पांडेय, ग्लोरियस एकेडमी के जीसी तिवारी समेत अन्य उपस्थित थे।
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इनसेट
ह्वील चेयर पर जाने से इनकार
वाराणसी। अस्पताल में तपस्वियों से मिलने पहुंचे पुरी शंकराचार्य को वार्डों तक जाने के लिए ह्वील चेयर लाई गई थी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ह्वील चेयर पर मखमली कंबल बिछाना शुरू किया। चेयर लेकर वह खुद शंकराचार्य की सफारी के गेट तक आए लेकिन शंकराचार्य ने उस पर बैठने से इनकार कर दिया। अस्वस्थ चल रहे पुरी पीठाधीश्वर का कहना था कि मरीजों से मिलने वह खुद मरीज बनकर चले, यह अच्छा नहीं लगेगा।

सुमेरु पीठाधीश्वर नंगे पांव, खड़ाऊं छूटी
वाराणसी। मंडलीय अस्पताल पहुंचते ही शंकराचार्य निश्चलानंद काशी सुमेरुपीठाधीश्वर को ढूंढने लगे। निजी सचिव निर्विकल्पानंद के अलावा अन्य संतों से उन्होंने पूछताछ की, तभी लाल रंग की एक कार आकर रुकी और धर्म की जय हो के नारे लगने लगे। नंगे पांव चिन्मयानंद महाराज को आते देख पुरी शंकराचार्य ने कहा कि खड़ाऊं तो पैर में डाल लो, जब देरी होने लगी तो सेवकों ने बताया कि जल्दबाजी में वह खड़ाऊं आश्रम में ही छोड़कर दौड़े चले आए हैं।

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