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केंद्र से खफा शंकराचार्य की महासंग्राम को झंडी

Varanasi Updated Sun, 20 May 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। गंगा पर केंद्र सरकार के रुख से खफा द्वारिका-शारदा ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने शनिवार की शाम स्पष्ट कर दिया कि याचना नहीं, अब रण होगा। दो दिन से दिल्ली में डेरा डाले शंकराचार्य ने हालात की समीक्षा के बाद अंतत: गंगा मुक्ति के मुद्दे पर जनांदोलन की अनुमति दे दी। 21 मई को काशी के बेनियाबाग मैदान में होने वाले गंगामुक्ति महासम्मेलन के लिए आज्ञा लेने पहुंचे कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम को उन्होंने आशीर्वाद दिया।
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शंकराचार्य से मुलाकात के बाद आचार्य प्रमोद ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि शंकराचार्य ने केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए जनांदोलन को ही विकल्प बताया है। मेहरौली में शंकराचार्य ने महासंग्राम की कमान संभाल रहे कृष्णम को निर्देशित किया कि अब दिल्ली कूच की तैयारी की जाए। सरकार जनता की आवाज से डरती है। गंगा को अगर मुक्त कराना है तो गंगा मुक्ति संग्राम को धार देनी होगी। सरकार को जताना होगा कि गंगा की अविरलता कायम रखने के लिए उसे ठोस निर्णय लेना ही पड़ेगा। इसके लिए विराट जनांदोलन करने की जरूरत है।
कृष्णम ने महासंग्राम से पहले पीएम की ओर से दूत भेजने की पहल को बेकार बताया। कहा कि सरकार की सोच पर हंसी आती है। यह मुद्दा ब्यूरोक्रेसी के बूते का नहीं है। सरकार को बड़ा राजनीतिक फैसला लेना होगा। उनकी मानें तो प्रधानमंत्री अगर गंगा का मुद्दा सुलझाना चाहते थे तो उन्हें गंगा की समस्या जानने के लिए दूत भेजने की जरूरत ही क्या थी। तर्क दिया कि पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन, नारायण सामी, कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल से दस दौर से अधिक हुई वार्ता के क्रम में गंगा की पीड़ा बताई जा चुकी है। फिर अफसरों को भेजने का अर्थ यह है कि उनके मंत्रियों में आपस में समन्वय नहीं है। पीएम भी बोल चुके हैं कि संत क्या चाहते हैं, जानता हूं। तो आखिर अफसर क्या करने आए थे? उन्होंने कहा कि अब या तो पीएम के मंत्री झूठे हैं या फिर वह गंगा के मसले को सुलझाना नहीं चाहते। ऐसी स्थिति में अब संग्राम होकर ही रहेगा।
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