प्रभु नारायण सिंहः स्मृति शेष

Varanasi Updated Fri, 11 May 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। गाजीपुर, बलिया, मऊ, बनारस के तमाम इलाके सन् 1942 की अगस्त क्रांति में आजाद हो गए। अंग्रेजों ने जनता को बर्बरता से कुचलकर आजादी की इस कोशिश को चंद दिनों में ही मिटा दिया, लेकिन उसकी दहशत और गूंज उनके मन में बरकरार रही। पूर्वांचल में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की कमी नहीं है, मगर प्रभु नारायण सिंह इस आंदोलन के नेताओं में से एक थे। उनको क्रांति की इस दास्तान के हर्फ-हर्फ और वर्क-वर्क बर्राक याद थे, मगर जिस कालखंड पर सबसे कम काम हुआ है, उसका दृष्टा चला गया। इतना ही नहीं, वह पूर्वांचल के किसान, श्रमिक और समाजवादी आंदोलनों के एकमात्र जानकार थे। काशी विश्वनाथ मंदिर में हरिजनों के प्रवेश की लड़ाई के वह एकमात्र जीवित योद्धा थे।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार सिंह के मुताबिक काशी विश्वनाथ मंदिर में हरिजनों के प्रवेश के लिए 1954 में 48 दिनों का आंदोलन चला था। इसमें राजनारायण का पांव टूट गया था। तमाम प्रगतिशील लोग जेल गए। संपूर्णानंद मुख्यमंत्री थे। अस्पृश्यता निवारण कानून बना और मंदिर का गर्भगृह हरिजनों के लिए खुल गया। आज बिना किसी भेदभाव के सनातन धर्म में आस्था रखने वाले मंदिर में दर्शन-पूजन करते हैं। उस समय काशी नरेश और स्वामी करपात्री जी महाराज ने इसका विरोध किया था। काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में एक और मंदिर स्थापित किया गया। कालांतर में महाराज बनारस ने खुद उस मंदिर में जाना छोड़ दिया। वह काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद के अध्यक्ष बने। इस एक घटना से काशी की प्रतिष्ठा दुनिया भर में बढ़ा दी।
मंत्रीपद मिलने के बाद भी उनमें वैचारिक विचलन नहीं आया। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर दो चिकित्सकों की तैनाती, तहसीलों में मुुंसिफ अदालतें स्थानांतरित करने जैसे ऐतिहासिक निर्णय लिए। वह लगातार मजदूरों को संगठित करने में लगे रहे। हिंद मजदूर सभा और हिंद मजदूर पंचायत के एकीकरण में भूमिका निभाई। समाजवादी पार्टी की पुनर्स्थापना में 1992 में सहयोग किया, लेकिन पार्टी की नीतियों के खिलाफ जाकर पूर्वांचल राज्य की मांग उठी तो आंदोलनकारियों को उनका पूरा समर्थन मिला। इन सभी आंदोलन के परभू बाबू इतिहास पुरुष थे। वह चले गए। अब आंदोलनों की दास्तान कौन बयां करेगा।

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