मूक सिनेमा का भी रिश्ता था बनारस से

Varanasi Updated Fri, 04 May 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। भारतीय सिनेमा सौ साल का हो गया। पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र तीन मई 1913 को प्रदर्शित हुई थी। बिना काशी के जिक्र के उसकी कहानी पूरी नहीं हो सकती थी। रुपहले पर्दे की महफिल में काशी का जिक्र उसी दिन से चल रहा है। अब तो पूरे देश के फिल्म उद्योग ने काशी को पीरियड फिल्मों की शूटिंग के लिए बेहतरीन जगहों में शुमार कर लिया है। हिंदी, बंगला, भोजपुरी, तेलुगू, तमिल और यहां तक कि हालीवुड की फिल्मों की भी शूटिंग के लिए यह शहर मीलों में पसरे खुले स्टूडियो की तरह है।
काशी में रंगमंच की समृद्ध परंपरा थी। सिनेमा ने पहली बार लोगों को चौंकाया था। मैजिक लालटेन के जादू से बनारस के लोग भी अछूते नहीं रहे। मूक फिल्मों के साथ गायक और संवाद बोलने वालों का दल भी चलता था, जो मंच पर बैठता था। प्रसंग के मुताबिक संवाद और गीतों का गायन करता रहता था। बुलानाला के विश्वाराध्य में पहली मूक फिल्म दिखाई गई थी। बांसफाटक के विश्वेश्वर थिएटर में भी मूक फिल्में प्रदर्शित होती थीं। उसके बाद तो दो दर्जन से अधिक सिनेमाहाल स्थापित हुए। काशी के आगा हस्र कश्मीरी के नाटकों और प्रेमचंद की कहानियों पर खूब फिल्में बनीं हैं। बीआर चोपड़ा ने अलीम मशरूर के उपन्यास ‘बहुत देर कर दी’ पर तवायफ फिल्म बनाई, जिसमें रति अग्निहोत्री, पूनम ढिल्लो ने अभिनय किया।
पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ की शूटिंग तो बनारस में हुई ही। बच्चू भाई साह की बिदेसिया की भाषा काशिका थी। सत्यजीत रे ने अपनी फिल्म ‘जय बाबा फेलूनाथ’ को बनारस की पृष्ठभूमि पर रचा और ‘अपूर संसार’ की शूटिंग यहीं की। मणिकौल ने सिद्धेश्वरी की शूटिंग बनारस में की। बांग्ला फिल्म ‘चोखेर बाली’, तेलुगू फिल्म ‘इंद्रा द टाइगर’ जैसी भारतीय भाषाओं की दर्जनों फिल्में यहां शूट हो चुकी हैं। दिलीप कुमार अभिनीत ‘संघर्ष’, सुजीत कुमार की ‘दंगल’, ‘बंटी बबली’, ‘लागा चुनरी में दाग’, ‘बनारस ए मिस्टिक लव स्टोरी’, ‘धर्म’ का फिल्मांकन यहां हुआ। यहीं बने वृत्तचित्र ‘स्माइल पिंकी’ को आस्कर मिला। संगीत निर्देशक एसएन त्रिपाठी ने ‘रानी रूपमति’, ‘लालकिला’, ‘संगीत सम्राट तानसेन’ फिल्मों में संगीत देकर ख्याति पाई। वह अभिनेता भी थे। बनारस के द्वारिका दास, श्रीनाथ दास ने बाक्सर जैसी तमाम फिल्में बनाई हैं। लीला मिश्रा, कन्हैया लाल, सुजीत कुमार, कुमकुम, असीम कुमार, पद्मा खन्ना से लगायत मनोज तिवारी तक यह सिलसिला अनवरत जारी है। गायक और फिल्म निर्देशक हेमंत कुमार काशी में 16 जून 1920 को पैदा हुए। भारतरत्न बिस्मिल्लाह खान, पं. रविशंकर, गोदई महाराज ने फिल्मों में वादन किया तो गोपीकृष्ण नृत्य के बूते पर ‘झनक-झनक पायल’ में नायक बने। सितारा देवी ने भी नृत्य निर्देशन किया। अनजान का ‘खाइके पान बनारस वाला’ और समीर के गीतों को भला कोई कैसे भूल सकता है।

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