मायानगरी से मोदी के लिए काशी लौटी तीसरी पीढ़ी

Varanasi Updated Thu, 08 May 2014 05:30 AM IST
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वाराणसी। इसे पीएम पद की उम्मीदवारी का आकर्षण कहें या बढ़ते राजनीतिक कद और लोकप्रियता का असर। वजह जो भी हो, लेकिन नरेंद्र मोदी का जादू राजनीति से कोसों दूर रहने वालों को भी अपनी ओर खींच रहा है। दरअसल, तीन पीढ़ी पहले काशी से महाराष्ट्र, गुजरात में जाकर बसने वालों के वंशज भी खुद को मोदी के प्रचार में कूदने से नहीं रोक सके हैं। अपने खाने-खर्चे पर काशी आए ऐसे कई परिवार हैं, जो इन दिनों तपती धूप की परवाह किए बगैर मोदी के लिए शहर की संकरी गलियों में सुबह निकलते हैं और लौटते हैं शाम को।
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इनसे मिलिए। ये हैं प्रवीण शंकर पंड्या। रामघाट से लगे सूतटोला मोहल्ले में इनका पुश्तैनी घर (मकान नंबर के. 25/82) आज भी मौजूद है। पूर्वजों ने कारोबार के सिलसिले में घर छोड़ मुंबई से नाता जोड़ लिया था। अब प्रवीण गुजरात के बड़ोदरा में शंकर पैकेजिया फैक्ट्री के मालिक हैं और जम्बो बैग के निर्यात का इनका कारोबार है। प्रवीण भाजपा के कार्यकर्ता भी नहीं हैं लेकिन वह अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों के साथ पिछले चार दिन से यहां डोर टू डोर जाने के अलावा जुलूस और दूसरे माध्यमों से मोदी का प्रचार कर रहे हैं। इतना ही नहीं महमूरगंज में उन्होंने मोदी के सिपाहियों के लिए मेस भी खोलवा दी है। पक्के महाल की गोला गली में खजांची सरकार की हवेली आज भी मौजूद है। मुंबई में बसे इस परिवार के संदीप सेलट और दिल्ली में दो पीढ़ी पहले से रहने वाले निखिल सेलट भी मोदी के प्रचार के लिए आए हुए हैं। मोदी को लेकर इनके मन में उम्मीद जगी है कि 65 बाद अब बनारस फिर दुनिया के अग्रणी शहरों में गिना जाने लगेगा। कपसेठी के गोविंदपुर गांव से करीब 70 साल पहले मुंबई के अंधेरी में जाकर छत्रपाल मिश्र ने भैंसों का तबेला खोलकर दूध का कारोबार शुरू किया था। मोदी को जिताने के लिए उनके पोते अमरजीत मिश्र अपनी पत्नी पूनम और पुत्री आकांक्षा के साथ काशी में घूम रहे हैं। पिंडरा के मानी गांव निवासी जयप्रकाश ठाकुर का परिवार भी तीन पीढ़ी पहले जाकर गोरेगांव में बस गया था। अब जयप्रकाश भी परिवार के सदस्यों के साथ अपने गांव के आसपास मोदी के प्रचार में पसीना बहा रहे हैं। इनका मानना है कि अब काशी के दिन बहुरेंगे। सड़के सुधरेंगी, बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं में इजाफा होने से कारोबार भी बढ़ेगा।
कोट - फोटो के साथ
- नरेंद्र मोदी के चुनाव लड़ने की जब जानकारी मिलने तो बहुत खुशी हुई। हम लोग चाहते हैं कि वे यहां का प्रतिनिधित्व करें। उनके आने से लगने लगा है कि बनारस बदल जाएगा। - अमरजीत मिश्र, अंधेरी-मुंबई

- देश को जब आजादी मिली तब काशी 10 अग्रणी शहरों में एक था। अब इस प्राचीन शहर का स्थान किस पायदान पर है, ढूंढना पड़ेगा। मुझे विश्वास है कि अब इसमें बदलाव आएगा। बनारस की खोई हुई छवि फिर वापस आएगी। - प्रवीण शंकर पंड्या, मुंबई
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