मोदी के खिलाफ सड़क पर उतरे बुद्धिजीवी

Varanasi Updated Mon, 05 May 2014 05:30 AM IST
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वाराणसी। साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता रविवार को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के खिलाफ सड़कों पर उतरे। संत कबीर की कर्मभूमि कबीरचौरा मूलगादी मठ में व्याख्यानों, नाटक, जनगीतों, कविताओं, पोस्टरों और दास्तानगोई के जरिए सांप्रदायिक फासीवाद के खतरों को रेखांकित किया गया। शाम को कबीर से प्रेमचंद तक की सांस्कृतिक यात्रा की गई। यात्रा को पुलिस ने रोकने की कोशिश की तो कहासुनी भी हुई।
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हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या। बनारस के संसदीय चुनाव में सक्रिय हस्तक्षेप के लिए प्रगतिशील एवं जनवादी सांस्कृतिक संगठनों के साझा सांप्रदायिक फासीवाद विरोधी मंच के राष्ट्रीय कन्वेंशन ‘विरासत कबीर’ की शुरुआत इप्टा पटना के कलाकारों ने कबीर के इस पद से किया। उसके बाद प्रसिद्ध कथाकार और मंच के अध्यक्ष काशीनाथ सिंह ने स्वागत भाषण में कहा कि काशी के इतिहास में यह अनूठा आयोजन है जब देश भर के प्रबुद्धजन सांप्रदायिक फासीवाद से लड़ने के लिए एकत्रित हुए हैं। तीस्ता सीतलवाड ने गुजरात माडल को झूठ का पुलिंदा बताते हुआ कहा कि वहां तानाशाही और कारपोरेट के विकास का माडल चल रहा है। चर्चा के दौरान कवि विष्णु खरे ने मोदी के खिलाफ पार्टी विशेष को वोट देने की वकालत की तो सबने विरोध करना शुरू कर दिया। अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि सांप्रदायिक शक्तियों के विरोध से यह विवेक खुद ही जाग जाएगा कि किसे चुनना है। इस बार का चुनाव भटकाने वाला और अजीब है। चंद लोगों ने मनमाने तरीके से अपना प्रधानमंत्री और उसे जनता पर थोपा जा रहा है। विकास पुरुष के नाम पर मोदी का जो चेहरा सामने आ रहा है, वह खतरनाक है। सभा को प्रो. दीपक मलिक, वीएन राय, अर्थशास्त्री जान ब्रेज, पत्रकार जावेद नवकी, सीमा आजाद, शबनम हाशमी, खगेंद्र ठाकुर, रुपरेखा वर्मा, हेमंत शाह, जेएनयू के अध्यक्ष अकबर चौधरी, वीरेंद्र यादव ने विचार व्यक्त किए। बीच-बीच में स्वप्निल श्रीवास्तव, संध्या नवोदिता, श्याम कश्यप ने कविताएं सुनाईं, प्रेरणा कला मंच के कलाकारों ने ‘राज करेंगे हम’ नाटक की प्रस्तुति की।
शाम को निकली यात्रा में चौथीराम यादव, गया सिंह, प्रणय कृष्ण, केके पांडेय, रितिका खेड़ा, राकेश आदि शामिल रहे। लहुराबीर चौराहे पर पुलिस ने सम्मेलन के पर्चे में मोदी पर प्रहार होने की बात का सहारा लेकर जुलूस को रोकने की कोशिश की तो साहत्यिकारों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इससे पहले दिन में भी पुलिस ने व्याख्यान के दौैरान राजनीतिक चर्चा करने पर आपत्ति जताई तो संचालन कर रहे व्योमेश शुक्ल ने विरोध किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रलेस के प्रदेश महासचिव संजय श्रीवास्तव ने किया।
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मोदी के चुनावी प्रोपगैंडा पर विचार करने की जरूरत है। गुजरात माडल स्पष्ट नहीं है। वहां वर्ष 1980 में स्कूलों में दोपहर भोजन की व्यवस्था थी, जो उस समय तमिलनाडु को छोड़ किसी राज्य में नहीं थी। गुजरात में प्राइवेट इंटरप्राइजेज ने कुछ खास नहीं किया है।
-जान ब्रेज, ख्यात अर्थशास्त्री
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नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में गुजरात में घृणा और हिंसा का दौर सबने देखा है। ऐसे व्यक्ति को मसीहा बताकर उसके लिए समर्थन जुटाया जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति माडल की तरह यहां प्रधानमंत्री चुनने की जो प्रक्रिया चल रही है, वह तानाशाही की ओर ले जाएगा।
विष्णु खरे, नामचीन कवि
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नरेंद्र मोदी को हराना बनारस की जनता का काम है। हम तो हकीकत बताने आए हैं। मोदी के जीतने पर सबसे बड़ा खतरा तो लोकशाही को होगा, व्यवस्था तानाशाह होती जाएगी। नफरत भरी राजनीति की शुरुआत अभी से हो गई है। तीसरा विकल्प खोजना होगा।
तीस्ता सीतलवाड़, सामाजिक कार्यकर्ता
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किसानों के आत्महत्या पर शोध करते समय पीपली लाइव जैसी फिल्म बनाने की प्रेरणा मिली। हमारी टीम ने विजयदान देथा की कहानी चौबोले की दास्तानगोई की। संवेदनशील व्यक्ति हर किस्से को अपने तरीके से लेता है। अब वह कैसे रिएक्ट करेगा, वह जाने।
अनुषा रिजवी, रंगकर्मी
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गुजरात माडल को लेकर देश में घटाटोप छाया हुआ है, जबकि हकीकत से उसका कुछ लेना-देना नहीं है। जनता को हकीकत जानने का हक है। हम हकीकत बताने आए हैं। बनारस लोकसभा चुनाव में यही हमारा सक्रिय हस्तक्षेप है।
-हेमंत कुमार शाह, लेखक
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