टाफी की तरह खाती है कांच

Unnao Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
उन्नाव। मात्र दो साल की उम्र में सिर से मां का साया उठने के बाद एक बच्ची ने वह चीजें खाना सीख लीं जिनके गलती से भी मुंह में चले जाने से बड़ों-बड़ों की जान पर बन आती है। गंजमुरादाबाद के बंजरिया रुरी सादिकपुर की आठ साल की रीता ने दो साल की उम्र से कांच, मैगनेट व ब्लेड खाना शुरू कर दिया। वह कांच की बोतल ऐसे खाती है जैसे चने चबा रही हो। हैरत की बात यह है कि पांच साल से इन चीजों को खाने के बावजूद उसे कोई दिक्कत नहीं हुई।
रुरी सादिकपुर निवासी गंगाराम रैदास की दूसरे नंबर की पुत्री रीता जब मात्र दो साल की थी तभी उसकी मां की मौत हो गई थी। गंगाराम के पास नाममात्र की जमीन है। इसलिए परिवार का भरण पोषण करने के लिए उसे मजदूरी करनी पड़ती है। पत्नी की मौत के बाद वह मजदूरी के सिलसिले में काफी समय बाहर रहता था। घर में बड़ी बेटी पुष्पा के अलावा रीता व एक रीता से साल भर छोटी बेटी है। पुष्पा भी छोटी थी जो किसी तरह से खाना आदि बनाती थी। मां का साया क्या उठा बच्चियों का देखभाल करने वाला कोई नहीं रहा। देखरेख के अभाव में रीता ने पहले कंकड़ व मिट्टी खाना शुरू किया। इसके बाद भी जब भूख शांत नहीं होती, तो कांच व ब्लेड खाने लगती। धीरे-धीरे उसे इन चीजों की आदत पड़ गई और पूरी की पूरी कांच की बोतल चबा-चबाकर खाने लगी। यही नहीं ब्लेड, चूड़ी, मैगनेट (चुंबक) भी बड़े चाव से खाती है। पिता गंगाराम व चाचा हीतेश कुमार ने बताया कि रीता दो साल की उम्र से इन चीजों को खा रही है। लगभग पांच साल बाद भी रीता की आदत नहीं छूटी। कई बार डांटा-फटकारा यहां तक की पिटाई भी की। अब सामने नहीं खाती पर चोरी छिपे जो भी सामान मिल जाता है उसे खा लेती है।


नहीं है कोई बीमारी
उन्नाव। छह साल से बच्ची लोहे, चुंबक कांच के सामान खा रही है लेकिन आज तक उसे कोई दिक्कत नहीं हुई। यही नहीं बाकायदा घर का सारा काम भी करती है। जानवरों का चारा पानी से लेकर खेत से घास आदि लाती है। घरवाले भी हैरान हैं कि जब लोहे व कांच आदि कैसे हजम कर लेती है। बच्ची ने कभी कोई दर्द होने की बात नहीं बताई। रीता पढ़ने नहीं जाती, घर में ही रहती है।

मनोवैज्ञानिक को दिखाएं
परिवारीजन उसे किसी मनोवैज्ञानिक को दिखाएं। इसकी कोई दवा नहीं है जिसे खिलाकर ठीक किया जा सके। मनोवैज्ञानिक इसे साइकोथैरेपी के जरिए ठीक कर सकते हैं। इसमें बातचीत और इन चीजों से दूर रखकर उसे ठीक किया जा सकता है। बच्ची पर बचपन में ध्यान नहीं दिया गया होगा। खाना आदि न मिलने पर इन चीजों को खाना सीख गई होगी। भले ही उसे अभी कोई दिक्कत न हो रही हो लेकिन भविष्य में हो सकता है कोई समस्या खड़ी हो जाए।
डा. डीपी मिश्रा, मुख्य चिकित्साधिकारी उन्नाव।

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