जिले में सूखती जा रही दूध की धारा

Unnao Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
उन्नाव। समय के साथ स्थितियां भी तेजी के साथ बदलती जा रही हैं। एक समय ऐसा था जबकि गांवों में दूध की भरमार होती थी और शहरों में में आपूर्ति गांवों से ही हुआ करती थी। इधर एक दशक में तेजी से स्थितियां बदली हैं। अब गांवों में कोई कार्यक्रम होता है तो दूध, घी, पनीर, खोया आदि की आपूर्ति शहर से होती है। दुधारू पशुओं के पालन को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का रुझान कम हो गया है। गांवों की खुशहाली का राज रही दूध डेरियां अब बंद हो चुकी है। शहरों की कुछ डेरियां अपने वाहन भेज कर कलेक्शन अवश्य करा रही हैं। कुछ मेहनतकश लोग ही अधिक संख्या में दुधारू पशुओं का पालन और दूध, घी आदि का व्यवसाय कर रहे हैं। हालांकि दुधारू पशुओं के पालन को विभिन्न योजनाएं भी संचालित हैं लेकिन बैंकों की उदासीनता के कारण यह परवान नहीं चढ़ पा रही हैं। विज्ञान के बढ़ते प्रसार से अब तो दूध ही नहीं खोया और पनीर भी बिना दूध के तैयार होने लगा है। हालांकि चिकित्सक इसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानते हैं।
विज्ञापन

क्या है कारण
दुधारू पशुओं के पालन के प्रति दिन प्रतिदिन कम होते जा रहे रुझान के लिए लोग बढ़ती महंगाई और एकल परिवार की प्रवृत्ति को ही प्रमुख कारण मानते हैं। महज एक दशक पूर्व जो भैंस पांच हजार रुपए कीमत की रही वह आज चालीस हजार में मिल रही है। संयुक्त परिवारों में पशुओं के पालन की जिम्मेदारी कोई भी उठा लेता था लेकिन एकल परिवार में अब पशुओं की देखरेख भी मुश्किल हो रही है।
स्लाटर हाउसों की भरमार
सरकारी योजनाएं भले ही ग्रामीणों को पशुपालन के लिए प्रोत्साहित कर रही हों लेकिन भारी क्षमता वाले रोज खुल रहे स्लाटर हाउस इसमें पलीता लगा रही हैं। मांस निर्यात से करोड़ों कमाने वाली यह इकाइयां पशुओं की बाजार से अधिक कीमतें दे रही हैं। इससे लालच में आकर लोग दुधारू पशु भी बेंच देते हैं। इसके प्रमाण आए दिन पकडे़ जाने वाले कंटेनर हैं। गांव-गांव इनके एजेंट फैले हैं जो कि किसानों से व्यापारी बनकर पशुओं का सौदा करते हैं और फिर उन्हें स्लाटर हाउस पंहुचा देते हैं। जिले में पशुओं की संख्या कम होती जा रही है।

कैसे होती है भरपाई
स्वस्थ एवं दुधारू पशुओं का वध करके मांस का व्यापार करने वाले स्लाटर हाउस चमड़ा, हड्डी आदि की भी कीमत वसूल रहे हैं। यह हड्डियों से चर्बी निकालकर उसे महंगे दामों में बेंच देते हैं। चमड़े से भी अच्छी कमाई होती है। इसके चलते खरीदार पशु पालकों को उनके मवेशी की अच्छी कीमत दे देते हैं।

चर्बी का खेल
खाद्य तेलों में चर्बी की मिलावट का कालोबार भी बड़े पैमाने पर चल रहा है। इस काले धंधे में लिप्त कारोबारी केमिकल के जरिए तेल और देशी घी में चर्बी की मिलावट कर बाजार में बेंच रहे हैं। औद्योगिक क्षेत्र के साथ ग्रामीण क्षेत्र में भी पुलिस की मिलीभगत से किया जाता है। करीब पांच वर्ष पूर्व तत्कालीन एसपी आशुतोष कुमार ने ताबड़तोड़ छापेमारी कर अवैध पशुवधशालाओं और चर्बी फैक्ट्रियों का खुलासा किया था।

क्या कहते हैं जिम्मेदार-
जिला पशु चिकित्साधिकारी डा. आरएन दीक्षित ने बताया कि दुधारू पशुओं की कमी के कारण ही दुग्ध उत्पादन गिरा है। दुधारू पशुओं की संख्या बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत प्रयास किए जा रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us