बिजली से हादसे छुपा जाते हैं जेई

Unnao Updated Tue, 03 Jul 2012 12:00 PM IST
उन्नाव। तार टूटने से होने वाली अधिकांश दुर्घटनाओं के पीछे जेई व लाइनमैनों की लापरवाही होती है। इसलिए अपनी गर्दन बचाने के लिए जेई अधिकांश दुर्घटनाओं की रिपोर्ट विद्युत सुरक्षा अनुभाग को नहीं देते हैं। इसके अलावा विद्युत सुरक्षा अधिकारी जब स्वत: संज्ञान लेकर या तहसील से सूचना के आधार पर जांच करते हैं तो कई नोटिसों के बाद भी जेई व लाइनमैन बयान देने नहीं पहुंचते हैं। इससे पीडि़तों को मुआवजा मिलने में दिक्कत आती है।
विद्युत सुरक्षा अनुभाग में इस वर्ष अप्रैल से जून तक दुर्घटनाओं के 17 मामले आए हैं। इनमें तार टूटने और उसकी चपेट में आने से 6 लोगों की मौत हुई। इनमें शुक्लागंज व मौरावां में तार की चपेट में आने से दो युवकों की मौतें भी शामिल हैं। वहीं चार जानवर भी आग में जल गए। अनुभाग के अधिकारियों ने जब इनकी जांच शुरू की तो अधिकांश में जेई व लाइनमैन की लापरवाही सामने आई। सूत्रों की मानें तो हर साल जर्जर तारों की मरम्मत के लिए लाखों रुपए खर्च कर काम केवल फौरी तौर पर निपटाया जाता है। इससे गर्मी के मौसम में तार टूटकर गिरते हैं और अग्निकांड का कारण बनते हैं। सूत्रों के मुताबिक, तार टूटने में जेई व लाइनमैन की जिम्मेदारी तय होती है इसलिए जानबूझकर यह लोग इसकी जानकारी नहीं देते हैं। इससे मुआवजा पाने में पीडि़तों को सालों लग जाते हैं।
विद्युत सुरक्षा निदेशक एके माथुर के मुताबिक, तहसील से मिलने वाली सूचना या अखबारों में छपने वाली खबरों का स्वत: संज्ञान लेकर मामलों की जांच की जाती है। अधिकांश मामलों में विद्युत अधिकारियों की लापरवाही ही सामने आती है। बताया कि जांच के बाद वह रिपोर्ट लखनऊ मुख्यालय भेज देते हैं। वहां से मुआवजा तय होता है। उन्होंने भी माना कि कई मामलों में जेई व लाइनमैन बयान देने नहीं आते हैं। हारकर उन्हें समन भेजकर बुलाना पड़ता है। अधिकांश मामलों में यह अधिकारी अपनी गर्दन बचाने के लिए पीडि़त की ही गलती बताते हैं जबकि जांच में अधिकारियों की ही लापरवाही सामने आती है।

पीडि़त सीधे दे सकता है सूचना
उन्नाव। तार टूटने से यदि कहीं कोई दुर्घटना होती है तो पीडि़त को सबसे पहले सबस्टेशन को फोन करके आपूर्ति बंद करानी चाहिए। इसके बाद लिखित तौर पर दुर्घटना की सूचना 24 घंटे के अंदर विद्युत विभाग के अधिशाषी अभियंता या सीधे विद्युत सुरक्षा कार्यालय में भी दे सकता है। वैसे विद्युत सुरक्षा के अधिकारी समाचार पत्रों या तहसील से मिलने वाली सूचना के आधार पर भी जांच करते हैं। जनहानि होने पर विद्युत विभाग एक लाख रुपए तक मुआवजा देता है। मवेशी या फसल जलने पर वैल्यू के हिसाब से सहायता दी जाती है।


चार साल बाद भी नहीं मिला मुआवजा
उन्नाव। विभाग मुआवजा देने में किस कदर लापरवाह है इसकी बानगी सोनिक निवासी शिवमंगल बाजपेई के मामले में देखने को मिलती है। अप्रैल 2008 को उनके खेत में पकी खड़ी ढाई बीघे गेहूं की फसल हाईटेंशन तार टूटने से जल गई थी। इसके बाद उन्होंने मुआवजे के लिए उच्चाधिकारियों से लेकर लखनऊ तक के अफसरों से गुहार लगाई लेकिन चार साल बाद भी उन्हें मुआवजा नहीं मिल सका। उनके जैसे न जाने कितने ऐसे किसान हैं जो मुआवजे के लिए सालों से विभाग के चक्कर लगा रहे हैं।

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