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उपभोक्ता फोरम ने दिलाया बीमा क्लेम

Unnao Updated Wed, 13 Jun 2012 12:00 PM IST
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उन्नाव। किस्त देने के बाद भी मौत के बाद बीमा क्लेम न देने पर उपभोक्ता फोरम ने एलआईसी पर जुर्माना ठोंका है। फोरम ने बीमा कंपनी को आदेश दिए हैं कि वह उपभोक्ता को बीमे की धनराशि के साथ ही क्षतिपूर्ति राशि अदा करे। इसके अलावा बीमे की राशि पर दावा स्वीकार करने की तिथि तक 18 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज भी देना होगा। साथ ही दो हजार रुपए परिवाद व्यय के भी देने पड़ेंगे।
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शुक्लागंज के आदर्श नगर निवासी सरोजनी देवी के पति सुरेश कुमार ने एलआईसी से 30 हजार रुपए का बीमा कराया था। 24 सितंबर 2006 को सुरेश कुमार की कालरा से मौत हो गई। सरोजनी देवी ने इसकी सूचना बीमा कंपनी को दी। इसके बाद वह कई बार क्लेम के लिए कार्यालय गईं, लेकिन उन्हें टरकाया जाता रहा। 21 सितंबर 2010 को सरोजनी देवी फिर कार्यालय पहुंची तोकंपनी ने दावा अस्वीकार कर दिया। हारकर उन्होंने 22 जुलाई 2011 को उपभोक्ता फोरम की शरण ली। यहां एलआईसी की तरफ से कहा गया कि सरोजनी ने दावे में पति की मृत्यु 23 सितंबर 2006 को रात करीब 10.30 बजे दिखाई है जबकि मृत्यु प्रमाण पत्र में 24 सितंबर 2006 दर्ज है। इसके अलावा चार वर्ष के विलंब से दावा किया और मृत्यु संबंधी प्रपत्र भी ठीक से प्रस्तुत नहीं किए गए। कंपनी के मुताबिक, सुरेश कुमार ने 28 जुलाई 2006 को पालिसी ली थी। इस पर प्रीमियम किश्त तिमाही अदा होनी थी। एक ही किश्त जमा हुई थी जबकि दूसरी अक्टूबर में देय थी, इसलिए उनका दावा अस्वीकार किया गया। फोरम ने पाया कि अल्पावधि मृत्यु दावे की बीमा कंपनी को गहन जांच करनी थी लेकिन पत्रावली में कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जिससे कंपनी द्वारा गहन जांच करने की पुष्टि हो सके। इसलिए फोरम अध्यक्ष पीयूष कुमार ने आदेश दिया कि बीमा कंपनी सरोजनी देवी को 30 हजार रुपए बीमा धनराशि व दावा अस्वीकार करने की तिथि तक 18 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज भी अदा करेगी। इसके अलावा 10 हजार रुपए क्षतिपूर्ति राशि व 2 हजार रुपए परिवाद व्यय के रुप में भी कंपनी को देने होंगे।


बिना विचार किए दावा नहीं हो सकता खारिज
उन्नाव। फोरम ने कहा कि सरोजनी देवी के पति की मृत्यु 23 सितंबर को रात 10.30 बजे कालरा से हुई थी जबकि प्रमाणपत्र में तिथि 24 सितंबर 2006 अंकित है। इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। क्योंकि रात को मृत्यु होने पर इसकी सूचना अगले दिन ही दी जा सकती थी। 24 सितंबर को दाह संस्कार होने पर प्रमाणपत्र में तिथि इसी दिन की अंकित हो गई। इसके अलावा काल बाधित होने के आधार पर दावा उस समय तक अस्वीकार नहीं किया जा सकता है जब तक इसके कारण पर विचार न कर लिया जाए। पीड़ित को पता नहीं था कि उसको बीमे की राशि का दावा करना है। वह यह समझती रही कि सूचना देने के बाद बीमा राशि का भुगतान अपने आप होगा।

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