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रुला कर चला गया दुनिया को हंसाने वाला

Unnao Updated Tue, 12 Jun 2012 12:00 PM IST
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उन्नाव। हास्य व्यंग्य कविता के माध्यम से गुदगुदाने वाले काका बैसवारी सभी को रुला कर दुनिया से चले गए। करीब आठ महीने से बिस्तर पर थे। करीब दस दिन पहले ही जिला अस्पताल से घर भेजा गया था। 77 वर्षीय काका ने सोमवार देर शाम अपने पैत्रक गांव अकवाबाद में अंतिम सांस ली।
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सूर्य प्रसाद द्विवेदी ‘काका बसैवारी’ पिछले कई साल से बीमार चल रहे थे। अक्तूबर 2011 में उनका स्वास्थ काफी खराब हो गया। जानकारी होने पर तत्कालीन विधायक कृपा शंकर और राज्यसभा सदस्य ब्रजेश पाठक ने 1 नवंबर 2011 को उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया था। करीब एक सप्ताह तक भर्ती रहने के बाद भी उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ। काफी कोशिशों के बाद वह कानपुर में इलाज कराने को तैयार हुए मगर तीसरे ही दिन उन्होंने अपने बेटे देवी प्रसाद द्विवेदी से घर ले चलने की जिद करने लगे। वह घर पहुंचने के बाद ही शांत हुए। बीते मई माह में उनकी हालत फिर बिगड़ी। उन्हे बीती 16 मई को दोबारा जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में 16 दिन भर्ती रहने के बाद उन्हों ने अपने स्वास्थ्य में सुधार बताकर सीएमएस डा. एलडी शुक्ला से छुट्टी देने की मंशा जताई। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वह अपने पैत्रक गांव बीघापुर के अकवाबाद गए और सोमवार शाम करीब 7 बजे दुनिया से विदा ले ली। काका बैसवारी अपने पीछे पत्नी सूर्यमुखी द्विवेदी, पुत्र देवी प्रसाद द्विवेदी और दो विवाहिता पुत्री नीलम व रागिनी को छोड़ गए है। मंगलवार को बक्सर घाट पर अंतिम संस्कार किया जाएगा।

मरते दम तक माटी का मोह नहीं छोड़ पाए काका
उन्नाव। लंबी बीमारी के बाद भी च्काकाज् अपने जिले की माटी का मोह नहीं छोड़ पाए। लंबी बीमारी के बाद भी वह कानपुर या लखनऊ में इलाज कराने को तैयार नहीं हुए। नवंबर 2001 में वह परिजनों और साहित्यकारों की काफी मान मनौव्वल के बाद कानपुर में इलाज करने के लिए तैयार हुए। मगर कानपुर हैलट में पहुंचते ही वह वापस घर चलने की जिद करने लगे उनकी जिद के चलते उन्हें तीसरे ही दिन अस्पताल में छुट्टी करानी पड़ी।


इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया काका नाम
उन्नाव। काका बैसवारी के निधन के साथ ही साहित्य जगत में काका नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया।
उत्तर प्रदेश के साहित्य के क्षेत्र से जुड़े चार काका में तीन उन्नाव जिले के थे। हाथरस के काका हाथरसी को छोड़ शेष तीन काका, रमई काका, बलई काका और काका बैसवारी उन्नाव की साहित्यिक विरासत को संजोए रहे। साहित्य के इस पुरोधा के संसार से विदा लेने के साथ ही काका उपनाम इतिहास में दर्ज हो गया। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को बैसवारा और उन्नाव ही नहीं प्रदेश और देश हमेशा याद रखेगा।

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