दोनों हाथों को कटने के बाद नहीं छोड़ी हिम्मत

Sonbhadra Updated Sun, 21 Oct 2012 12:00 PM IST
म्योरपुर। ....कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों। यह कहावत शशांक शेखर त्रिपाठी पर एकदम सटीक बैठती है। दोनों हाथ कटने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कठिन परिश्रम करके उच्च शिक्षा हासिल की। इस समय वे और उनकी पत्नी एक प्राइवेट विद्यालय में बच्चों को अच्छी तालीम देने में लगे हैं।
सोनांचल में प्रतिभावानों की कमी नहीं है। इन्हीं में से एक साहसिक और विलक्षण प्रतिभा के धनी नामों में शशांक शेखर का भी नाम है। शशांक दोनों हाथों से विकलांगता का दंश झेलते हुए भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाकर लोगों के लिए नजीर बन गए हैं। शशांक मूल रूप से जिले के नक्सल प्रभावित इलाके पन्नूगंज थाना क्षेत्र के अहेई शिवाला के रहने वाले हैं। शशांक का पांचवीं कक्षा में पढ़ने के दौरान ही 1990 में घर में ही स्थित चारा काटने वाली मशीन से हाथ कट गया था। काफी इलाज के बाद भी दोनों हाथ गंवाने के बाद पढ़ने जाने में असमर्थ हो गए। बकौल शशांक उस दौरान उन्हें दूसरे बच्चों को पढ़ने जाते देखकर यही लगता था कि सभी बच्चे पढ़ने जाते हैं सब शिक्षित हो जाएंगे, ऐसे में वे अशिक्षित रह जाएंगे। इसी सोच के साथ उन्होंने पहले पैरों से लिखना शुरू किया। हाथों में अभी भी घाव होने के कारण पैरों का प्रयास अधिक सफल नहीं हो सका। इससे दुखी होकर उन्होंने घाव भरने का इंतजार किया। इस दौरान उनका घाव भरने के बाद हाथों से लिखने का प्रयास शुरू किया।
करीब पांच से छह माह के अथक प्रयास के बाद नन्ही सी उम्र में ही उन्होंने कटे हुए हाथों से लिखना शुरू कर दिया। इसके बाद तो उनको मानों उनको पर लग गए हों। उस समय पढ़ाई शुरू करने के बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हाईस्कूल की परीक्षा आदर्श इंटर कालेज रामगढ़ से पूरी की। इसके बाद उन्होंने इंटर की पढ़ाई राजा शारदा महेश इंटर कालेज से पूरी की। ओबरा डिग्री कालेज से स्नातक की डीग्री पाने के बाद उन्होंने एमए संत किनाराम पीजी कालेज से किया। इसके बाद वे प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना संजोए वाराणसी स्थित अपने फूफा रविकांत मिश्र के घर चले गए। इस दौरान उन्होंने पीसीएस का प्राथमिक स्तर की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। इसी बीच उन्होंने यूपी कालेज से बीएड की डिग्री भी हासिल कर ली। अपने किए गए प्रयास में सफलता न मिलने के कारण वे निराश हो नहीं बैठे उन्होंने टीजीटी की परीक्षा उत्तीर्ण की। अच्छा रिश्ता आने पर परिवार के लोगों ने उनकी शादी वाराणसी में संध्या से कर दी। विकलांग पति होने के बाद भी संध्या ने पढ़ी लिखी होने का परिचय देते हुए पति का खूब साथ दिया। दो भाई एक बहनों में दूसरे नंबर के शशांक का प्रयास यहीं थमा नहीं है उन्होंने पढ़ाई के बाद म्योरपुर स्थित बिड़ला विद्या मंदिर में इंटर के छात्रों को हिंदी पढ़ाना शुरू कर दिया। गृह विज्ञान से एमए होने के कारण उनकी पत्नी भी इसी विद्यालय में लड़कियों को गृह विज्ञान की शिक्षा दे रही हैं। शशांक के इस प्रयास से जहां बच्चे सीख ले रहे हैं वहीं सहयोगी भी उनकी चर्चा करते नही थक रहे हैं। शशांक के इस प्रयास के लिए प्रधानाचार्य सिपाहीलाल पटेल ने भी तारीफ की।

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