खनन, क्रशर बंदी से कबूतरबाजों ने काटी चांदी

Sonbhadra Updated Wed, 22 Aug 2012 12:00 PM IST
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ओबरा (संवाददाता)। जिले में पत्थर खदानों की बंदी से कबूतरबाजों का धंधा तेजी पकड़ लिया है। बेरोजगारी का फायदा यह उठाने लगे हैं। क्षेत्र से अन्य प्रांतों में मजदूरों की सप्लाई भेजने वाला लगभग आधा दर्जन गिरोह सक्रिय है। प्रशासन की शिथिलता के कारण ऐसे कबूतरवाज मोटी रकम लेकर मजदूरों को गुलामी एवं यातनापूर्ण वातावरण में काम करने को विवश कर देते हैं। ऐसे ही दो कबूतरवाजों का खुलासा होने से क्रशर क्षेत्र के मजदूरों में दहशत व्याप्त है।
स्थानीय शारदा मंदिर के पास रहने वाला कबूतरबाज वीरेंद्र मुंशी ने आसपास के झोपड़पट्टियों से लगभग 50 मजदूरों को महाराष्ट्र के पूना स्थित सीमेंट ब्रीक बनाने वाली कंपनी में भेजा। कंपनी द्वारा यातना दिए जाने व बंधुआ मजदूरी कराए जाने से पीड़ित होकर इन मजदूरों की टोली से सोनू पुत्र प्रदीप किसी तरह भाग कर घर लौटा तब कहीं जाकर मामले का खुलासा हुआ। सोनू ने बताया कि वीरेंद्र मुंशी द्वारा कहस गया था मजदूरों को दो सौ रुपये रोज की मजदूरी व रहने का डेरा दिया जाएगा, जिससे वीरेंद्र के झांसे में आकर जटाशंकर, संतोष, सुनील, बाबा, डेविड, ममता, शंकर, गुड्डी सहित लगभग 50 मजदूर पूना के लिए गए थे, लेकिन वहां पर मजदूरों से 24 घंटे काम लिया जाता रहा। उसके अलावा कंपनी ठेकेदार द्वारा उनके साथ बराबर अमानवीय व्यवहार भी किया जा रहा है। सोनू ने बताया कि मेरी तबीयत खराब हो गई थी, लेकिन इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी। हमने घर जाने की इच्छा जाहिर किया तो मुझे मारा पीटा गया। रात के अंधेरे में बिना किराया के हम वहां से किसी तरह भाग निकलने में सफल हुए। भूखे प्यासे पूना से मिर्जापुर तक पहुंचने में मुझे लगभग एक सप्ताह लग गया। क्योंकि पैसे के अभाव में ट्रेन का टिकट नहीं ले पाए थे, जिससे रास्ते में रेलवे पुलिस द्वारा बार बार ट्रेन से बाहर कर दिया जाता रहा। मिर्जापुर पहुंच कर अपने मां को फोन से सूचित किए तब कहीं जाकर ओबरा अपने घर पहुंच पाए। इसके अलावा दूसरे कबूतरवाज का भी मामले का उजागर हुआ। स्थानीय निवासी लालती देवी ने बताया कि बिल्ली रेलवे स्टेशन के पास रहने वाला काशी सेठ ने भी तीन माह पूर्व लगभग 50 मजदूरों को दिल्ली आनंद बिहार के लिए भेजा था, जिसमें हमारा पुत्र राम सूरत भी गया है। तीन महीने से मेरे लड़के को कोई मजदूरी का पैसा नहीं दिया जा रहा है। काशी सेठ के घर पर अक्सर ताला बंद रहता है, जिससे लड़के के तबीयत की भी सही जानकारी न मिलने के कारण मन बहुत व्याकुल है। क्रशर बंदी का खामियाजा झेल रहे मजदूर अपना पेट पालने के लिए दर दर की ठोकर खाने पर मजबूर हैं। ऐसी स्थिति में प्रशासन इस पर कड़ा निर्णय नहीं लेता है तो बेरोजगार हुए हजारों मजदूरों को यातनापूर्ण जीवन बिताने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

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