पहले अध्यक्ष के लिए नगरपालिका ने किया नौ साल इंतजार

Sonbhadra Updated Wed, 13 Jun 2012 12:00 PM IST
कृष्ण मुरारी मिश्र
सोनभद्र। राबर्ट्सगंज नगर पालिका लगातार बदलाव के दौड़ से गुजरी है। अदलगंज से बदल कर टाड का डौर 1928 में परिवर्तित होकर राबर्ट्सगंज नगर पंचायत के रूप में लोगों के सामने आया। आजादी की लड़ाई में सहभागिता निभाते हुए लोकतंत्र का पहरुआ बना तथा 1979 में विकास के लिए नगर पंचायत से नगर पालिका का दर्जा प्राप्त किया। किराए के मकान से अपने कार्यालय होते हुए नगरपालिका आज भी बदलावों के दौड़ से गुजर रहा है। नगरपालिका के रूप में अस्तित्व में आने के बाद से अब तक चार अध्यक्षों का कार्यकाल देख चुका है और पांचवें अध्यक्ष के लिए पलक फावड़े बिछाए हुए हैं।
जनपद की एकमात्र नगर पालिका राबर्ट्सगंज का इतिहास अत्यंत रोचक है। समुद्रतल से सैकड़ों फीट की ऊंचाई पर बसे दुर्गम इलाका पूर्व अदलगंज के नाम से प्रसिद्ध रहा। इस दौरान भी यह इलाका आसपास के लोगों के लिए व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा। वक्त के साथ क्षेत्र में बदलाव हुआ तथा इसका नाम बदल कर टांड का डौड़ हो गया। अंग्रेज शासनकाल के अंतिम चरण में पंद्रह अक्टूबर 1928 में टाड़ के डौड को नगर पंचायत का दर्जा देते हुए इसका नाम राबर्ट्सगंज कर दिया गया।
इस दौरान इसकी आबादी करीब पांच हजार रही होगी। इसके बाद से यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था शुरू हो गई। यहां अध्यक्ष मनोनीत होने लगे। राबर्ट्सगंज नगर पंचायत के पहले अध्यक्ष होने का गौरव बद्रीनारायण को मिला। इसके बाद बलराम दास गुप्त, भोला प्रसाद अग्रवाल और श्याम सुंदर झुनझुनवाला ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। आजादी के बाद चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई तथा 1971 में अजय शेखर नगर पंचायत अध्यक्ष चुने गए। 12 अगस्त 1977 को इनके कार्यकाल समाप्ति के बाद 1980 तक क्रमश: प्यारे मोहन और वीके मल्होत्रा ने प्रशासक के रूप में कार्य संभाला। इसी दौरान 27 मार्च 1979 में इसे नगर पालिका का दर्जा दे दिया गया। इस दौरान यहां की आबादी करीब पंद्रह हजार रही। नगरपालिका घोषित होने के बाद यहां नौ वर्ष तक चुनाव नहीं हुआ तथा इस दौरान यहां के प्रशासन की बागडोर क्रमश: पीके मिश्र, एके मिश्र, एएन उपाध्याय और राजेन्द्र भोनवाल ने संभाली। पहले चुनाव में एक दिसंबर 1988 को जितेन्द्र सिंह चयनित हुए। इनके कार्यकाल समाप्त होने के बाद से एक बार फिर यहां प्रशासनिक व्यवस्था लागू हो गई तथा केएम संत तथा एकएम लाल ने व्यवस्था संभाली। एक दिसंबर 1995 को एक बार फिर नगर पालिका की बागडोर अजय शेखर को मिली। वर्ष 2000 में हुए चुनाव में यहां के लोगों ने एक बार फिर पहले नगरपालिका अध्यक्ष जितेन्द्र सिंह की पत्नी निशा सिंह को विजयी बनाया। इनके कार्यकाल समाप्ति के बाद करीब एक वर्ष तक प्रशासनिक व्यवस्था लागू रही तथा राधेश्याम प्रशासक रहे। इसके बाद हुए चुनाव में विजयी होकर आए विजय जैन ने 14 नवंबर को नगर पालिका अध्यक्ष की कमान संभाली, तेरह नवंबर को कार्यकाल समाप्त हुआ तो फिर से प्रशासनिक व्यवस्था लागू हो गई जो अब तक जारी है। अब चूंकि नगर निकाय चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है। ऐसे में देखना है कि पांचवें नगर पालिका अध्यक्ष के रूप में कौन चयनित होता है।

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