श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन बही भक्ति धारा

Sonbhadra Updated Wed, 30 May 2012 12:00 PM IST
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दुद्धी। नगर के प्राचीन महावीर मंदिर में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन आचार्य राजललन गोपाल महाराज के अमृतवाणी वर्षा में कथा सुनने आए श्रद्धालु सराबोर हो उठे। महराज के एक एक अनमोल वचनों को सुन पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
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श्रीमद्भागवत कथा के महात्मय का वर्णन करते हुए महाराज ने कहा कि जब कुंती ने भगवान से विपत्ति का वरदान मांगा तो प्रभु अचरज में पड़ गए, क्योंकि ईश्वर से मांगने वाला हर व्यक्ति अपने परिवार के लिए सुख समृद्धि, यश-सम्मान, रुपये पैसे जैसे वरदान मांगता है। मगर कुंती एक ऐसी भक्त थी जो अपने इष्ट देव से अपने लिए विपत्ति (दुख) जैसा वरदान मांगी थी। कुंती जानती थी कि दुख में ही लोग ईश्वर को याद करते हैं इसलिए भगवान के करीब रहने व उनका चिंतन करने के लिए विपत्ति मांगा। परंतु ईश्वर ने कहा कि नहीं तुमने जीवन में बहुत दुख उठाए हैं। अब मै वरदान में तुम्हें विपत्ति देकर अपने आप को दोषी नही साबित करूंगा।
इस क्रम में महाराज ने कहा कि यदि कोई कार्य करने से पूर्व किसी विशेष आराध्य देव की स्तुति कर वह कार्य किया जाए तो निविघ्नतापूर्वक संपन्न होता है। वहीं भगवान के चौबीस अवतारों की व्याख्यान करते हुए कहा कि भगवान सभी अवतार धर्म की स्थापना एवं रक्षा के लिए करते हैं। पृथ्वी पर जब-जब अत्याचार व बुराईयां बढ़ी हैं, तब-तब ईश्वर ने सर्वनाश के लिए अवतार लिया है। महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा के महात्मा का व्याख्यान करते हुए कहा कि इतने बड़े नगर और आबादी से चलकर यहां तक आए भक्तों को ही इस कथा श्रवण का लाभ देने की नियति ईश्वर ने बनाई है। कथा का समापन आरती भजन व प्रसाद वितरण के साथ किया गया।
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