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अपनी पहचान खो रहा महाभारत कालीन धन्नाग तीर्थ

Lucknow Bureauलखनऊ ब्यूरो Updated Sun, 10 Nov 2019 11:51 PM IST
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सिधौली (सीतापुर)। महाभारत कालीन धन्नाग तीर्थ को पिछले दो दशक से पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग हो रही है। सितंबर में एक प्रतिनिधिमंडल ने डीएम अखिलेश तिवारी से मुलाकात कर अपनी मांग दोहराई थी। इस पर डीएम ने आश्वासन दिया था।
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द्वापर युग के इस ऐतिहासिक धन्नाग तीर्थ आज भी विरासत को संजोए हैं। यहां हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगता है। मंगलवार से मेले की शुरुआत हो रही है। 15 दिनों तक चलने वाले इस मेले के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर भगवान शंकर का दर्शन-पूजन करते हैं।
मंदिर के चारों ओर कई मील के दायरे में फैले इस तीर्थ की प्राकृतिक सुंदरता तथा सरोवर में असंख्य कमल दल बरबस ही हर किसी का मन मोह लेते हैं। तीर्थ परिसर में पेड़ों के नीचे हर समय साधु-संतों का डेरा रहता है। हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर यहां विशाल मेला लगता है। मेले में जिले के अलावा गैर जनपदों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
पूर्व मंत्री श्यामलाल रावत के प्रयासों से जर्जर हो चुके मंदिर का कायाकल्प तो हो गया था, लेकिन प्राचीन व ऐतिहासिक इस तीर्थ को अपेक्षित पहचान आज तक नहीं मिली है। क्षेत्र के समाजसेवी रामलखन शुक्ला इस तीर्थ को पर्यटन स्थल का दर्जा देने के लिए दो दशक से प्रयासरत हैं।
एक प्रतिनिधिमंडल के साथ वह धन्नाग तीर्थ से अयोध्या तक पदयात्रा कर चुके हैं। इसके बाद धन्नाग से नैमिषारण्य और फिर चंद्रिका देवी तीर्थ तक पदयात्रा कर जन जागरण करते हुए इस तीर्थ को पर्यटन स्थल के रूप में घोषित करने की मांग उठाई। लेकिन उनकी आवाज सरकार के कानों तक नहीं पहुंची।
एक प्रतिनिधिमंडल के साथ उन्होंने 13 सितंबर को डीएम अखिलेश तिवारी से मुलाकात कर तीर्थ के सरोवर को ग्राम पंचायत से हटाकर धन्नाग तीर्थ में दर्ज करने का अनुरोध किया था। डीएम ने मौके का अवलोकन करने का आश्वासन दिया था। शासन-प्रशासन की अनदेखी से तीर्थ की रमणीयता मिटती जा रही है।
अर्जुन के नाम पर पड़ा तीर्थ का नाम
सीतापुर और बाराबंकी जिले की सीमा पर ग्राम पंचायत नीलगांव में स्थित धन्नाग तीर्थ को धनंजय के नाम से भी जाना जाता है। इसका इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है।
प्रचलित किवंदती के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडव इधर से गुजर रहे थे। हरे-भरे पेड़ों के बीच स्थित विशाल सरोवर वाली यह एकांत जगह पांडवों को इस कदर भा गई कि उन्होंने कुछ दिन यहां ठहरने का मन बना लिया।
कई महीनों तक इस जगह रुकने के दौरान अर्जुन ने यहां पर महादेव को स्थापित किया था। तभी से अर्जुन के नाम पर इसे धनंजय तीर्थ कहा जाने लगा, जो अब धन्नाग तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है।
रचनाओं में है तीर्थ का वर्णन
इस ऐतिहासिक तीर्थ का उल्लेख साहित्यकारों की रचनाओं में भी मिलता है। स्थानीय लेखक व कवि कृष्ण बिहारी अवस्थी व मानपुर निवासी इतिहास के जानकार व लेखक रामगोपाल ने इस तीर्थ की महिमा का वर्णन अपनी रचनाओं धनंजय महिमा तथा धन्नाग चालीसा में किया है।
उपेक्षा से आहत हैं लोग
पौराणिक धन्नाग तीर्थ पर हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला मेला इस बार मंगलवार से शुरू हो रहा है। धन्नाग तीर्थ विकास समिति के संयोजक रामलखन शुक्ल और सुधाकर सिंह तीर्थ की उपेक्षा से आहत हैं। इन्होंने शासन से इसे पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग की है।
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