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21 वर्षों से लटका खेतिहर जमीन की नापजोख का विवाद

Lucknow Bureauलखनऊ ब्यूरो Updated Sun, 16 Feb 2020 11:45 PM IST
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रामपुर मथुरा (सीतापुर)। गांजरी इलाके में घाघरा नदी के कटान से समाहित हो रही जमीन का विवाद पिछले 21 वर्षों से लटका पड़ा है। तीन जिलों की सीमा विवाद के कारण जमीन की नापजोख नहीं हो पा रही है। इससे पांच ग्राम पंचायत के करीब 500 किसानों की पांच हजार बीघा जमीन पर दबंग कब्जा किए हुए है। यह दबंग ही फसल बोते है और उसे काट ले जाते है।
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जिन किसानों की जमीन है वह राजस्व परिषद से लेकर जिलाधिकारी व उन्नाव तक की भागदौड़ कर रहे है, लेकिन उनको जमीन का मालिकाना हक नहीं मिल पा रहा है। जब किसान अधिक उग्र होते है तो नाप शुरू होती है, लेकिन सीमा विवाद के कारण यह फिर रुक जाती है। इससे किसान परेशान है। वह जमीन पर कब्जा पाने के लिए अधिकारियों के चक्कर लगा रहे है।
जिले के अधिकारी इसे नापजोख प्रक्रिया उन्नाव जिले से संचालित होने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेते है। रामपुर मथुरा विकासखंड में बहने वाली घाघरा नदी के भीषण कटान में अब तक चार ग्राम पंचायतों शुकुलपुरवा, अंगरौरा, कनरखी व अटौरा गांव की हजारों एकड़ भूमि समा चुकी है। प्रत्येक वर्ष नदी अपनी धारा व स्थान बदलती रहती है। कभी सैकड़ों एकड़ भूमि एक तरफ तो कभी दूसरी ओर छूटती रहती है।
यह नदी तीन जनपदों सीतापुर, बाराबंकी व बहराइच की सीमाओं को मिलाते हुए बहती है। इसलिए जो जमीन छूटती है उस पर भू-माफिया द्वारा अवैध कब्जा करने का खेल शुरू हो जाता है। कब्जा करने में कभी कभी खूनी संघर्ष भी हो जाता है। इस विवाद को निपटाने के लिए करीब 21 वर्ष पहले राजस्व परिषद ने रिकार्ड ऑपरेशन शुरू किया था। इसमें तीन जिलों का सीमा विवाद निपटाया जाना था।
इसके लिए एक एआरओ की तैनाती की गई थी। तीन लेखपाल को जमीन की नापजोख करने की जिम्मेदारी दी गई थी। यह एआरओ व लेखपाल उन्नाव जिले में बैठते है। पीड़ित किसानों का कहना है कि कई बार लेखपाल आए, लेकिन वह जमीन की नापजोख नहीं कर सके है। जब क्षेत्रीय लेखपाल जाते है तो वह भी इन लेखपालों से ही मिलते है।
कभी दूसरे जिले से नापजोख होती है तो वह सीतापुर जिले के अंदर तक पहुंच जाते है। इससे इस जमीन का विवाद निपट नहीं पा रहा है। इसी का फायदा उठाकर भू माफिया जमीन पर कब्जा कर लेते है। वह प्रतिवर्ष फसल बोते है और उसे काटकर मुनाफा काम लेते है। इस अवैध कब्जेदारी को लेकर कई बार जानलेवा संघर्ष भी हो चुके है।
करीब तीन वर्ष पूर्व अरहर की फसल काटने को लेकर गोलियां चल चुकी है। वास्तविक भूमिधर किसान कमजोर और गरीब होने के कारण अपनी खतौनी लिए लेखपालों की परिक्रमा करते करते हार थक कर चुप बैठ गए है। सर्वे में तैनात लेखपाल कानूनगो से क्षेत्रीय भूमाफिया की अच्छी पकड़ है। यह भूमाफिया इतने दबंग किस्म के है कि एक बार जमीन पर कब्जा हो जाने के बाद प्रशासन को इस जमीन को मुक्त कराने में हाथ पांव फूल रहे है।
पुलिस और राजस्व प्रशासन की अनदेखी के कारण वास्तविक किसान इन गांवों से पलायन कर मजदूरी करके जीवन यापन करने को विवश है। इससे चार ग्राम पंचायत के करीब 40 गांवों के 500 किसान प्रभावित है। इनकी करीब पांच हजार बीघा जमीन विवाद में फंसी हुई है।
थक चुके किसान
किसान दीपक तिवारी व राजकिशोर का कहना है कि हमारी जमीन कटान में चली गई थी। इस जमीन को वापस लेने के लिए अफसरों को शिकायत करते-करते थक चुके है। लेकिन आज तक समस्या का निराकरण नहीं हो सका है।
दबंग बराबर खेती कर रहे है। उमाशंकर, विजय बहादुर व लालमणि का कहना है कि एआरओ व तीन लेखपाल की मिलीभगत से यह हो रहा है। जिलाधिकारी को इसमें हस्तक्षेप करके किसानों को जमीन दिलानी चाहिए। हर बरस यही विवाद उत्पन्न हो जाता है। जिले की सीमा विवाद का लाभ भू माफिया उठाते है।
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