विदेशी पेड़ों पर सजेंगे ‘लाक्षागृह’

Sitapur Updated Sat, 13 Oct 2012 12:00 PM IST
सीतापुर। इसे ही कहते हैं ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ सीतापुर जिले के किसान अब परंपरागत खेती के साथ ही लाख का भी उत्पादन कर सकेंगे। यह दोहरी खेती उनकी आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करेगी। मजे की बात तो यह है कि इस सबके लिए किसानों को न तो अधिक मेहनत करने की जरूरत और न ही अतिरिक्त पैसा खर्च करने की आवश्यकता है। कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) द्वितीय (कटिया) के वैज्ञानिकों ने एक कार्य योजना तैयार की है। जिसके तहत लाख का कीड़ा (कीट) पालने के लिए नेपाल राष्ट्र का पौधा फ्लेमिंजिया सेमियालता (भालिया) किसानों को मुफ्त दिया जाएगा।
किसान अपने खेत या बाग में पौधे लगाकर इस पर लाख के कीड़े को पाल सकते हैं। दरअसल भारत में लाख का कीड़ा पलाश, बेर, बबूल, जंगल जलेबी, कुसुम, पापुलर, पीपल, अरहर, आकाशमनी आदि पेड़ों पर ही पाला जाता है। नेपाली पेड़, ‘फ्लेमिंजिया सेमियालता’ (भालिया) लाख के कीट पालन के लिए सबसे अच्छा पेड़ माना जाता है। इस पौधे को खाद एवं पानी की ज्यादा जरूरत नहीं होती है। कृषि विज्ञान केंद्र द्वितीय (कटिया) के कृषि वैज्ञानिक (पादप) डॉ. डीएस श्रीवास्तव बताते हैं कि जिले भर में एक लाख पौधे लगाने की योजना है। मौजूदा समय में केवीके पर एक हजार पौधे उपलब्ध हैं। यह सभी पौधे इसी केंद्र पर उगाए गए हैं। इसके बीज भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोंद संस्थान, नामकुम, रांची से मंगाए गए हैं। यह पौधे चयनित किसानों को मुफ्त दिए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि जो किसान लाख की खेती में रुचि रखते है लेकिन उनके पास लाख का कीट पालने के लिए उपयुक्त पेड़ नहीं है उनके लिए भालिया सबसे अच्छा पेड़ है।

यह होता है लाख
व्यवहारिक रूप में यह एक प्राकृतिक राल है। जो केरिया लैक्का नामक मादा कीट द्वारा मुख्य रूप से प्रजनन के बाद स्राव के रूप में निकलता है। इस कीट को कुछ विशेष पेड़ों की डालों पर पाला जाता है। लाख का कीट अपने शरीर को सुरक्षित रखने के लिए एक प्रकार का तरल पदार्थ निकालता है, जो सूखकर कवच बना लेता है और उसी के अंदर मादा कीट जीवित रहती है। इसी कवच को लाख या लाह कहते हैं।

भालिया पर होती दोनों तरह की लाख
लाख दो प्रकार की होती है जिन्हें रंगीनी तथा कुसुमी कहते हैं। रंगीनी कीट की फसल प्रमुख रूप से पलास, बेर के पेड़ों पर होती है। इसके अलावा गलवांग, आकाशमनी, पुतरी, संदल एवं पीपल पर भी रंगीनी कीट पालते हैं। रंगीनी लाख बरसात और गर्मियों के मौसम में होती है। इसके लिए जुलाई और अक्तूबर माह में पेड़ों पर कीट छोड़े जाते हैं। जुलाई में पेड़ों पर छोड़े जाने वाले कीटों से चार माह बाद ही अक्तूबर में लाख प्राप्त हो जाती है। जबकि अक्तूबर में छोड़े जाने वाले कीटों से आठ माह बाद लाख प्राप्त होती है। कुसुमी लाख मुख्य रूप से कुसुम, बेर के पेड़ों पर होती है। हालांकि आकाशमनी, पुतरी और गलवांग आदि पेड़ों पर भी इस कीट को पाला जाता है। यह लाख सर्दियों और गर्मियों के मौसम में होती है। इसके लिए जुलाई और जनवरी में पेड़ों पर कीट छोड़े जाते हैं। जिनसे लगभग छह माह में लाख प्राप्त हो जाती है। भालिया ही एक ऐसा पेड़ हैं, जिस पर दोनों प्रकार की लाख होती है।

120 रुपये प्रति किलो मिलती लाख
भालिया पेड़ की ऊंचाई करीब तीन मीटर होती है। इसे इंटरक्रॉपिंग (अंत: फसल) के रूप में बोया जा सकता है। एक हेक्टेअर भूभाग पर भालिया के आठ हजार पौधे लगाए जा सकते हैं, जिससे एक फसल चक्र में करीब चार लाख रुपये की ‘लाख’ तैयार की जा सकती है। यह पेड़ साल भर हरा-भरा रहता है। भालिया के एक पेड़ में 100-150 ग्राम बीहन (लाख के कीट युक्त डंडी) लगती हैं। जिससे 500-750 ग्राम लाख निकलती हैं। मौजूदा समय में लाख 100 से 120 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रही हैं।

लाख का इस्तेमाल
लाख को विभिन्न चीजों को सीज करने में बहुतायत से उपयोग किया जाता है। शू-पॉलिश, वारनिश, रंग और सौंदर्य प्रसाधन बनाने में किया जाता है। विभिन्न प्रकार की दवाओं और फल संरक्षण में भी इसका उपयोग किया जाता है।

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