पराली जलाएं तो जेल जाएं, न जलाएं तो जेल जाएं

Gorakhpur Bureauगोरखपुर ब्यूरो Updated Fri, 30 Oct 2020 07:11 PM IST
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पराली निस्तारण किसानों के लिए बनी मुसीबत
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धान कटाई के बाद पराली रखने की व्यवस्था नहीं होने से परेशानी
कटाई से ज्यादा बटोरने में लग रही मजदूरी
जिले में 1.76 लाख हेक्टेयर भूमि पर हुई है धान की खेती
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। धान की पराली किसानों के लिए मुसीबत बन चुकी है। अगर जलाते हैं तो केस दर्ज होता है और जुर्माना भरें। वहीं अगर शासन के दिशा-निर्देशों का पालन करें तो उसे बटोरें और रखें कहां। साथ ही फसल की लागत भी बढ़ रही है। किसान नेता और किसानों में इससे नाराजगी है। उनका कहना है कि पहले निस्तारण की व्यवस्था करनी चाहिए, उसके बाद उस पर रोक लगानी चाहिए। मगर किसानों पर आदेश थोपा जा रहा है, जिससे उन्हें परेशानी हो रही है।
बढ़ते हुए पर्यावरण प्रदूषण के नियंत्रण के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से किसानों के खेत में फसल के अवशेष को जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। फसल का अवशेष जलाए जाने पर केस दर्ज करने के साथ ही जुर्माना और जेल का भी प्रावधान है। मगर यह कानून किसानों के लिए अब मुसीबत बन चुका है। धान की पराली का केवल पशुओं के चारे में लिए उपयोग होता है। अब पशुपालन वालों की तादाद कम है। ऐसे में किसान कंबाइन से कटने के बाद पराली कहां ले जाएं, यह उनके लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। किसानों का कहना है कि जितने में फसल कट जाता है, अब पराली खेत से निकालने में उसे अधिक मजदूरी लगा रही है। सरकार और स्थानीय प्रशासन को किसानों की समस्या पर ध्यान देने की जरूरत है। औदही कला गांव निवासी किसान चैतू, बसंतपुर निवासी इमरान अहमद, चरिहवां निवासी विश्वनाथ यादव और चंद्रभान कहते हैं कि पराली जलाने से मना तो कर दिया, लेकिन किसान पराली का करें क्या और उसे कहां ले जाएं। इसके बारे में विचार नहीं किया गया। डीएम दीपक मीणा ने बताया कि पराली निस्तारण के संबंध में शासन की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों का पालन कराया जा रहा है। अगर कोई पराली जला रहा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
एक हेक्टेयर में आ रही इतनी लागत
किसानों के मुताबिक एक हेक्टेयर खेत की पराली बटोरने और उसे एकत्र करके दूसरे स्थान पर ले जाने में कम से कम 3500 से 4000 रुपये का खर्च आ रहा है। पराली कोई पूछने वाला नहीं है, वह रुपये का खर्च करना पानी में फेंकने जैसा है। इससे फसल की लागत बढ़ रही है।
रखने में भी हो रही दिक्कत
अगर किसान पराली बटोर ले रहा है, तब भी उसके समक्ष रखने की समस्या खड़ी हो रही है। एक एकड़ की पराली को रखने के लिए खाली जगह होनी चाहिए, वह हर किसानों के पास नहीं है। अगर खेत में रख रहा है तो कुछ हिस्से पर खेत को परती छोड़ना पड़ेगा। इससे किसान को दोनों तरफ से नुकसान हो रहा है।
इतने रकबे पर हुई है धान
जिले में प्रमुख दो फसलें लगाई जाती हैं। इसमें धान और गेहूं की खेती बड़े रकबे पर होती है। गेहूं के अवशेष का भूसा के रूप में प्रयोग हो जाता है। मगर धान की पराली से भूसा नहीं बन पाता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो जिले में 1.76 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती हुई है। ऐसे में इतने बड़े रकबे की पराली का निस्तारण करना किसानों के लिए मुसीबत है।
सरकार किसानों थोप रही है कानून
सरकार को चाहिए के वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण, फैक्ट्री से नियमित निकलने वाले प्रदूषण को रोके। जहां से हमेशा दिक्कत बनी हुई है। किसानों का समय निर्धारित है। अगर फसल का अवशेष जलाया जाना अपराध है तो उसके निस्तारण की व्यवस्था पहले की करनी चाहिए। पराली के निस्तारण के चलते गेहूं की बुवाई लेट जाती है। फसल पर लागत बढ़ रही है। सरकार किसानों पर कानून थोप रही है। किसानों का शोषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
- कपिलदेव राय राष्ट्रीय महासचिव भाकियू अंबावत।
इस प्रकार करें पराली का निस्तारण
सिद्धार्थनगर। कृषि वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केंद्र सोनहा डॉ. एसके मिश्र ने बताया कि पराली निस्तारण के लिए किसान फसल की कटाई के बाद पांच किलो प्रति बीघा की दर से खेत में यूरिया डालकर खेत में पानी भर दें और जुताई करा दें। इससे अवशेष खाद के रूप में प्रयोग हो जाएगा। इसके अलावा 20 ग्राम वेस्टेड-डी कंपोजर को दो किलो गुड़ के घोल में पांच दिन के लिए रख दें। पांच दिन बाद उसे 200 लीटर पानी में डाल दें और दो दिन तक रहने दें। इसके बाद एक एकड़ खेत में घोल का छिड़काव कर दें। इससे पराली जल्दी सड़ जाएगी और जुताई में खत्म हो जाएगी। इसके बिना जुताई के सुपर सीडर से गेहूं की बुवाई कर देंगे। पानी भरने और खाद डालने के बाद वह खुद सड़कर खत्म हो जाएगी। इससे फसल को लाभ मिलेगा।
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