ऐसे तो मरती रहेगी ‘आरुषि’और फंसते रहेंगे मां-बाप

Siddhartha nagar Updated Tue, 26 Nov 2013 05:41 AM IST
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सिद्धार्थनगर। देश के बहुचर्चित आरुषि तलवार हत्याकांड के मामले में न्यायालय ने मृतक के मां-बाप को दोषी करार देते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया है। इसके बाद से हर जुबां पर एक बार फिर से इस केस का जिक्र छिड़ गया है। कुछ लोग फैसले से इतर इसे समाज के लिए गंभीर चिंतन का मुद्दा बता रहे हैं तो कुछ लोग तलवार दंपति के कृत्य की भर्त्सना कर रहे हैं।
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पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष एसपी अग्रवाल कहते हैं कि दरअसल हमें घटना के पीछे के कारणों पर नजर डालना होगा। यह कहानी उस परिवार की है, जहां एक मासूम को उसके मां-बाप की व्यस्तता ने उससे दूर कर दिया था। उसे ऊंच-नीच या सही गलत की जानकारी नहीं थी। यह समझाने के समय पर उसके अभिभावक अपनी दुनिया में मसरूफ थे। पूरा मामला समाज के लिए एक सबक है। बच्चों से दूर होते मां-बाप आगे भी आरुषि की कहानी को जन्म देंगे। हमें सोचना होगा।
समाजसेवी मनोज श्रीवास्तव कहते हैं कि आरुषि मामले में तलवार दंपति पूरी तरह से दोषी हैं। उन्हें सख्त से सख्त सजा भी मिलनी चाहिए। बच्चे से उन्होंने अपेक्षाएं तो खूब रखीं, मगर उसे उस ओर राह दिखाने के लिए उनका प्रयास नहीं था। आरुषि ने अगर गलती की थी तो उसे समझा-बुझाकर सुधारा जा सकता था। कानून किसी को किसी की जान लेने का हक नहीं देता। मां-बाप ने खुद बेटी को मारकर इस रिश्ते के आदर्शों की भी हत्या की है। एक साथ दो हत्या और फिर पुलिस को गुमराह करना गलत था।
युवा व्यवसाई अनिल मित्तल भी इसके पीछे एकल परिवारों के बढ़ते चलन और आधुनिकता की अंधी दौड़ को दोषी बता रहे हैं। बोलते हैं कि अगर हमने अब अपना नजरिया न बदला तो आगे भी ऐसी कहानियां इतिहास दोहराती मिलेंगी। मां-बाप अपने कर्तव्यों से दूर हो रहे हैं। आधुनिक होने की भूख में वह मान बैठे हैं कि पैसा ही सब कुछ है। इसके दम पर वह न केवल अपनी संतान को संस्कारी बना सकते हैं, बल्कि उसके लिए बेहतर भविष्य भी गढ़ सकते हैं। हकीकत उलट है।
व्यापारी उमेश पांडेय बताते हैं कि बच्चे को अगर सही मार्गदर्शन नहीं मिलेगा तो वह गलती तो करेगा ही। लेकिन उसकी गलती की सजा मां-बाप अगर इस तरह से देने लगें तो मानवता खत्म हो जाएगी। तलवार दंपति इस मामले में न सिर्फ कानूनन दोषी हैं बल्कि उन्होंने अपने दायित्वों को भी ठीक ढंग से नहीं निभाया। उन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए, जिससे समाज के आगे एक नजीर बनाई जा सके। इस तरह का अपराध अंजाम देने से पहले लोग सौ बार सोचें।
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