गन्ना किसानों के सपनों पर हुआ कुठाराघात

Siddhartha nagar Updated Fri, 22 Nov 2013 05:41 AM IST
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सिद्धार्थनगर/बढ़नी। प्रदेश सरकार ने बुधवार को 2013-14 पेराई सत्र के लिए गन्ना मूल्य घोषित किया है। अपने आप को किसानों का हितैषी बताने वाली समाजवादी पार्टी की प्रदेश सरकार ने गन्ना मूल्य में इस बार कोई बढ़ोत्तरी न करके गन्ना किसानों के ऊपर कुठाराघात किया है। इससे क्षेत्र के गन्ना किसानों में भारी रोष व्याप्त है।
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बढ़नी देहात का यह सीमाई क्षेत्र जो कि गन्ने की खेती के क्षेत्र में शायद जिले में अपना एक स्थान रखता है। गन्ने के मूल्य में वृद्धि को लेकर क्षेत्र का गन्ना किसान बहुत ही आशावान था लेकिन बुधवार को प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार द्वारा गन्ने के मूल्य में कोई वृद्धि न करके गन्ना किसानों के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया गया है, जिससे क्षेत्र के गन्ना किसानों में असंतोष की एक लहर-सी दौड़ गई है और चारों तरफ सरकार के गन्ना मूल्य न बढ़ाये जाने के निर्णय की निंदा की जा रही है। बताते चलें कि गत पेराई सत्र की भांति इस सत्र में भी गन्ने के मूल्य कुछ इस प्रकार हैं- अनुपयुक्त प्रजाति का दर 275 रुपये, सामान्य प्रजाति का गन्ना 280 रुपये और अगैती गन्ने का 290 रुपये प्रति क्विंटल की दर से सरकार ने बुधवार को घोषित किया है। गन्ना की यही कीमत पिछले वर्ष गन्ना किसानों को मिली थी। क्षेत्र के गन्ना किसान पंडित बाबूराम शुक्ल, विद्या मंदिर इंटर कॉलेज के प्रबंधक युधिष्ठिर शुक्ल ने सरकार द्वारा इस वर्ष पेराई के सत्र में गन्ने के मूल्य में वृद्धि न करने के प्रदेश सरकार के निर्णय पर रोष व्यक्त करते हुए कहा कि लगातार मंहगाई के बढ़ने के कारण गन्ना खेती के लागत में भी भारी वृद्धि हुई है। मजदूरी, खाद व डीजल में वृद्धि से गन्ना खेती के लागत में भी वृद्धि हुई है। इस लिहाज से गन्ने के मूल्य में वृद्धि न क रके सरकार ने गन्ना किसानों के साथ अन्याय किया है। इस बारे में गन्ना किसान व पीस पार्टी के जिला कोषाध्यक्ष इमरान अहमद ने कहा कि सरकार के द्वारा घोषित गन्ने के मूल्य में वृद्धि न होना केवल चीनी मिलों के दबाव में लिया गया निर्णय है। खुद को किसानों का हमदर्द कहने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार का यह निर्णय किसान विरोधी है। इसका नुकसान सपा को आगामी लोकसभा के चुनाव में होगा। हिंदू युवा वाहिनी के जिला महामंत्री अजय सिंह ने कहा कि सरकार ने गन्ने के मूल्य में छह वर्षों में पहली बार वृद्धि न करके गन्ना किसानों के हितों पर कुठाराघात किया है। जब गन्ना के खेती के लागत बढ़ी है तो सरकार को गन्ने के समर्थन मूल्य में भी उसी हिसाब से वृद्धि करना चाहिए था। सरकार को अपने निर्णय पर पुन: विचार करना चाहिए। पेशे से शिक्षक सुमेरू गिरि ने कहा कि सरकार ने केवल इस निर्णय में चीनी मिलों को ही रियायत दिया है। सरकार के निर्णय को जानकर तो ऐसा लगता है कि गन्ना किसान सरकार के लिए कोई मायने नहीं रखते।
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