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समृद्धशाली अतीत का धनी है बिस्कोहर

Siddhartha nagar Updated Thu, 28 Mar 2013 05:30 AM IST
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इटवा। समृद्धशाली अतीत को समेटने वाला बिस्कोहर कस्बा आज बदहाल हो चुका है। कस्बे का अतीत जितना शानदार था वर्तमान उससे कहीं ज्यादा बदसूरत हो चुका है। तहसील मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर पश्चिमी छोर पर स्थित कस्बा बिस्कोहर ठाकुर जयमंगल सिंह का था। वे बड़े जमींदार थे लेकिन संपत्ति की जंग में हार गए। सरल और उदार व्यक्तित्व के स्वामी जय मंगल सिंह जब हार गए तो स्थानीय लोगों ने उन्हें जंगहारा राजपूत कहना शुरू कर दिया। उनकी विशेषता यह थी कि वे अपनी प्रजा का दु:ख नहीं सहन कर पाते थे। उन्होंने प्रजा की भलाई के लिए रियासत में मालगुजारी और लगान माफ करवा दिया था।
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बस्ती गजेटियर के अनुसार बिस्कोहर कस्बा अत्यंत महत्वपूर्ण स्थानों में से एक था। सन् 1861 तक नेपाल राष्ट्र के पहाड़ी मूल के लोगों का बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र था। बिस्कोहर से नेपाल को तंबाकू, घी, चावल, चीनी और रूई आदि का निर्यात किया जाता था। जबकि नेपाली मूल के पहाड़ी थारू भारी मात्रा में जड़ी बूटी बिस्कोहर बाजार में पहुंचाते थे। गजेटियर के अनुसार 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से बिस्कोहर के जमींदार ठाकुर जयमंगल सिंह जंग हार गए थे। 18वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल तक बिस्कोहर कस्बा विषहर नगरी के नाम से पूरे भारत में प्रसिद्ध था। उस समय यहां की आबादी 2931 थी। इनमें 2,201 हिंदू, 728 मुस्लिम और दो लोग अन्य धर्म के थे। उस समय यहां का राजस्व 650 रुपये था। बिस्कोहर में नेपाल के थारूओं द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों से ऐसी जड़ी बूटियां लाई जाती थीं जो विष का हरण करने में रामबाण काम करती थीं।
ऐसा भी सुना जाता है कि सांप आदि जहरीले जानवरों से काटे लोगों की मौत के बाद भी नेपाली थारू पहाड़ी जड़ी बूटियों से दो तीन दिन में जहर उतारकर लोगों को जीवित कर देते थे। इसीलिए इस कस्बे को विषहर नगरी के रूप में भी जाना जाता था।
दस हजार की आबादी वाले इस छोटे से कसबे में 365 कुएं और मंदिर थे। यह सिद्ध करता है कि यह पूरा गांव शैव परंपरा गढ़ था। मौजूदा समय में 365 मंदिरों में से केवल 16 मंदिर और दो कुएं ही रह गए हैं। सत्रहवीं शताब्दी में बने इन मंदिरों और कुओं के पीछे भी विष को हरने वाली बात साबित होती है।
कहा जाता है कि क्षेत्र के 365 शिव मंदिरों में नेपाल के पहाड़ी थारू रहा करते थे और जड़ी बूटियों के सहारे लोगों का इलाज करते थे। मंदिरों के बगल में कुं आ भी इसीलिए रखा जाता था ताकि कुओं के जल से जहर पीड़ित व्यक्ति को स्नान कराकर उसका इलाज किया जा सके। इन प्राचीन मंदिरों के अस्तित्व की कहानी पुरातत्वविद् परीक्षण के उपरांत ही प्रमाणित हो सकती है। वर्तमान समय में यह कस्बा अपना समृद्धशाली अतीत भूल चुका है। कसबे में जलजमाव और गंदगी और यातायात की लचर व्यवस्था ने इस कसबे के गौरवशाली अतीत पर चादर डाल दी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह कस्बा फिर भी अपनी पुरानी धरोहर बचाए रख सकता है जब सरकार इस कस्बे का पुरातत्व सर्वेक्षण कराकर यहां के विकास और संरक्षण का कार्य करें।

सभी मिलकर मनाते हैं होली
सिद्धार्थनगर। बिस्कोहर कस्बे में हिंदू और मुस्लिम आबादी है। यहां आज भी गणिकाएं हैं। कस्बे में होली के दिन पश्चिम छोर से ढोल, बाजे के साथ सभी वर्गोें के लोग और गणिकाएं होली खेलने निकलती हैं। चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान। इस कस्बे में सभी धर्माेें के लोग होली, दीपावली, ईद और दशहरा मिलकर मनाते हैं।
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